पतझड़

प्रफुल्ल, सन्तुष्ट, प्रमुदित तुम्हारा
कल्पित अदनवाटिका में मुग्ध होना
काल्पनिक प्रसंग सुना रिझाना
मेरी विवशता
पतझड़

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4 thoughts on “पतझड़

  1. सुन्दर रचना , विवशता की विवशता है की पतझड भी जीवन का अभिन्न अंग है ….मौसम बदलने प्रकृति का या जीवन का नियम है. यथार्थ धरातल पर ले आता है आसमान से . आप तो ज्ञानी और विचारक है …आप का अंतर्प्रकाश ही काफी है वसंत के आगमन के लिए …..विवशता को हारने के लिए ……

  2. पतझड़ हमेशा नहीं बनी रहती आती है और चली जाती है वृक्ष पर नयी कोमल पातियाँ निकलने के लिए पतझड़ जरूरी है, और उस वृक्ष के जीवन के लिए उसे भोजन प्रदान करने के लिए पुरानी पतियों का झाड़ना आवश्यक है पतझड़ बहुत ही महत्वपूर्ण है जीवन के लिए

    • bahut aashavaadi varnan hai patjhad jaise prasang ka—-

      dhoke itne khaye ab to khud par hi vishwas nahi,
      mai patjhad ki shajadi mera koi madhumas nahi—-

  3. पतझड़ को हम और भी कई नामों से जान सकते हैं – शरद, शरत्काल ,पतन, ढलान, विनाश, पराजय, झरना,खिजा पर अभिप्राय और प्रसंग आपने अद्भुत प्रस्तुत किया है विवशता को छोड़कर ,विवशता शब्द आप पर नहीं जचता ,कविता में भी नहीं

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