मतलबी इन्सान

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मतलबी इन्सान

ख़ुशी की खोज में स्वार्थी बना ख़ुदगर्ज़

पुरुषार्थ के आनंद में खोया

शैतान  दुष्ट या निर्दयी का अनुसरण करता

सदा भागता रहता अपनी अन्तरात्मा से

गौरव की प्राप्ति में प्रतिष्ठा दाव पर लगा

ख़ौफ़नाक असत्य के पीछे बेपरवाह भागता

असत् घृणित कृत्यों में लीन लापरवाह

महिमामई गौरवशाली पदवी की तालाश सदा

पुनरुत्थान,

अंतःकरण जाग्रत होते ही

शांति की तलाश प्रारंभ

विवेकपूर्ण उद्यम से ही गरिमामई बड़प्पन की प्राप्ति

ज्ञान का प्रबोध होने पर ही मर्यादामई अनुगमन

निस्स्वार्थ निष्काम मनुष्य का जन्म

मनुष्यत्व

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8 thoughts on “मतलबी इन्सान

  1. आपने सही कहा है सर। शिखर पर पहुंचने की लालसा में आज बहुसंख्यक लोग अंतरात्मा की बात सुनने को भी तैयार नहीं होते। जीवन के पांच-छह दशक बीत जाने के बाद उन्हें अपनी गलतियों का अहसास होता है। तब वे युवा पीढ़ी को जीवन की यह सच्चाई समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन युवा पीढ़ी इसे नकार देती है।
    मुझे लगता है कि लोगों की सोच बदलने के लिए विस्तृत योजना चाहिए, लेकिन यह बहुत मुश्किल है। मेरी यह बात कुछ निराशावादी जरूर है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य में मुझे सकारात्मक होने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।

  2. आज कल की कलयुगी जिन्दगी में निराशावाद इन्सान में कूट कूट कर भर गया है कतरे कतरे में निराशावाद दिखाई देता है यह सत्य है। कारण हमारे आस पास का वातावरण। यहाँ इंसान ही इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। सुबह समाचार पत्र पढने से रात को टेलिविजन पर ख़बरें देखने तक सिर्फ चरों तरफ दुःख ही दुःख दिखाई देता है। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, व्यभिचार, सड़न, घूसखोरी, दुष्टता, चोरी डकेती, अपहरण, बलात्कार, दहशत गर्दी, आतंकवाद, चारों और सिर्फ नैतिक पतन। वो भारतीय सभ्यता अब खो सी गयी है वो समाज अब बदल गया है।
    अगर सिर्फ येही काफी नहीं तो ऊपर से अपराधियों का पकड़ में न आना या फिर साफ़ छूट जाना। जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं रहा कल क्या हो। इसलिए दिमाग में दो ही बाते आती हैं, एक जिन्दगी को जितना जी सकते हो जी लो और दूसरा की आज के समाज में केवल बुरे इंसान का ही महिमा गान होता है। अब इतनी नकारात्मकता के बीच निश्चयात्मकता कहाँ से लायें। दुविधा है। सही कहा की सोच बदलनी होगी और वोह भी युवा पीढ़ी को, कैसे होगा विचार का विषय है मंथन जरुरी है।

    • सर, क्या योग इसमें महत्वपपूर्ण भूमिका निभा सकता है? संभवतः यह सच हो,लेकिन लोगों को इसमें संदेह है। दावा किया जाता है कि मैडिटेशन के जरिये विचारों के प्रवाह को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन मैंने सालों तक मैडिटेशन करने वालों को ये कहते सूना है कि ध्यान क्रिया करते वक़्त भी तरह-तरह के विचार मन में दौड़ते रहते हैं।

      अगर ये मान भी लें कि योग इस समस्या का हल है। तो भी क्या बाज़ार की ताकतें इसे सफल होने देंगी?

      • इस समस्या का हल कविता में ही निहित है
        “अंतःकरण जाग्रत होते ही

        शांति की तलाश प्रारंभ

        विवेकपूर्ण उद्यम से ही गरिमामई बड़प्पन की प्राप्ति

        ज्ञान का प्रबोध होने पर ही मर्यादामई अनुगमन

        निस्स्वार्थ निष्काम मनुष्य का जन्म

        मनुष्यत्व”

        ज्ञान, विवेक, अंतःकरण एवम् मनुष्यत्व, इन्ही की प्राप्ति से नकारात्मकता से छुटकारा पाया जा सकता है
        योग हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है “स्वयं” को जानने के लिए और स्वयं को जाने बिना प्रबोध की प्राप्ति नहीं होती

  3. योग के बारे में कोई टिपण्णी नहीं करूंगा योग बहुत ही जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया है इस भौतिकतावादी समाज से क्या अपेक्षा रखे

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