प्रकाशमान निस्तब्धता

अँधेरे में खुली खिड़की से झांकती रौशनी की लकीर।

बदतर होती तक़दीर को हौसला दिलाती है।

तेरे प्यार की एक झलक पाने को।

पांव में पड़े छालो की परवाह किये बिना।

वो मीलों चलती चली जाती है।।

प्यार एक कसक है, वो तड़प है।

जो पतंगे को दीपक पर खींच लाती है।

झुलस जाना है फिर भी।

खिंची चली आती है मीलों दूर से।

प्यार की प्यासी वो।।

दूर से दीखता प्रकाशपुंज।

ज्योति है या ज्वाला।

पास आने पर ही पता चलता है।

धर्म, स्वाभाव स्वरुप इसका निराला।।

स्रष्टि चाहें अनेक हों लेकिन।

प्रकृति इसकी एक है।

पास आने पर जला देता है।

प्यार मुहब्बत प्रणय का उन्माद।।

तब उफनता है निसर्ग भाव से।

ह्रदय में, अविरोध नीरव शांत।

अत्यंत प्रेमभाव।

चिरकाल तक सदैव।।

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9 thoughts on “प्रकाशमान निस्तब्धता

    • Thank you Bhaiya, I am trying my best, taking out time between busy schedules. I read a lot, a habit I inherited from papa and cultivated since. I think I also inherited the power to think and analyse the day to day events around me, feel my surroundings, the environment and get stimulated to write. Papa too was a good writer, he wrote different things though and so are you, you started to express long before I did and so did didi, though she does not pen any thing any more.

    • I was different from very beginning I think. An abnormal restless child. Absolutely different thinking, entirely different philosophy of life. Though on my blog, I call my philosophy temporal but you know the philosophy can hardly ever be temporal. It had always been closer to abstract, metaphysical type or more like ad-hoc conceptualism.

    • दीपक जी आप को रचना पसंद आई आप का कोटि कोटि धन्यवाद बाकी रचनाओ पर भी आपकी विवेचना/व्याख्या का इंतज़ार रहेगा

  1. सर, प्रेम को बहुत सरल और गहराई के साथ समझाया है आपने। मुझे लगता है कि इससे ज्यादा अच्छे से प्रेम को नहीं समझाया जा सकता।

    सर, आखिरी पंक्तियों में आपने लिखा है कि प्यार मोहब्बत, प्रणय का उन्माद पास आने पर जला देता है और इसके बाद हृदय में अत्यंत प्रेमभाव उभरता है। सर, अल्पज्ञान की वजह से मैं इस बात को नहीं समझ पा रहा हूं कि प्यार में जल जाने पर उसी व्यक्ति के प्रति चिरकाल तक रहने वाला प्रेमभाव कैसे पैदा हो सकता है। मेरा अनुभव कहता है कि समय के साथ ही वह प्रेमभाव भी गायब हो जाता है। कृपया मेरी जिज्ञासा को शांत करने का कष्ट करें।

    • प्यार, मुहब्बत, प्रणय, और प्रेम का अंतर समझना पड़ेगा। अपने , परिवार और दोस्तों के आगे बढोगे तो समाज के प्रति असल प्रेम की जाग्रति होगी। प्रेम एक अनेकार्थी शब्द है रचना में श्लेशालंकार का प्रयोग है। रचना द्विअर्थी है असल मतलब जानने के लिए और गहरा गोता लगाना होगा।

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