व्यर्थ की स्मृतियाँ

बारिश के भीगे पन्नो पे लिखा है क्या क भी?
अक्षर फैल के सिर्फ स्याही के धब्बे बन जाते हैं।
बीते हुए दिन हाय कभी वापस नहीं आते हैं।
आती है तो केवल धुंधली सी याद ।
बौछार में बही स्याही के धब्बे जैसी ।
असंगत, तितर बितर, बेतरतीब, निराकार,
अव्यवस्थित स्मृति ।
तुच्छ, व्यर्थ, मूल्यहीन ।।

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