अवसर

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समय बलवान होता है।

ऐ इंसान।

तू क्यों परेशान होता है।।

हाथ में तेरे क्या है।

विधि का विधान पहले से लिखा है।।

तक़दीर से टकराना, यदि दैवनिर्दिष्ट है।

तो टकराव से प्रारब्ध भी प्राप्त हो सकता है।।

यदि नहीं।

तो ये तेरा दुर्भाग्य।

तेरा विनाश हो सकता है।।

भाग्य विधाता ने खींची है लकीर।

लक्ष्मण रेखा है, उसे पार करना।

विध्वंशक, प्राणहर विनाशक हो सकता है।।

समय बलवान होता है।

परन्तु कर्म प्रधान होता है।।

विधि की लकीर अमिट नहीं।

कर्म की निहरनी से उसे।

ध्वस्त कर डाल।

खंडित कर तबाह कर दे।

नियति की विडम्बना से, उसे बदल दे।।

क्यूंकि।

समय बलवान होता है।

सिर्फ समय।।

समय, समय आने पर पंख लगा उड़ जाता है।

युग भी काल के गाल में समां जाता है।।

पारिश्रमिक कृत्य कभी नहीं क्षीण होते।

समय बलवान होता है।

तो होता रहे।।

समय को समय आने पर देख लेंगे।

भयातुर नहीं निर्भय हैं हम।

देव या दानव नहीं।

मनुष्य हैं हम।

मायावी नहीं मानवी।

पूर्णतः मानुषिक।।

समय बदलना हमें भलिभातीं आता है।।

समय बलवान होता है, तो क्या।

तो क्या, हम अशक्त हैं।।

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