यथातथ्य

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दौड़ते दौड़ते शाम हो गयी।

मोहब्बत भी अब बदनाम हो गयी।।

प्यार एक शब्द बन कर रह गया।

माया जाल सब जगह फ़ैल गया।।

 

थक गया ब्रम्हाण्ड।

भाग रही अब भी मानवजाती।।

सृष्टि का होगा अंत।

लुप्त हो जाएगी प्रजाति।।

 

व्यथा फैली चारों ओर।

पग पग पर  है शोक, संताप।।

प्यार मोहब्बत भूली दुनिया।

प्रतिद्वन्दता में समाज भुला संलाप।।

 

अनुचित कार्य करने पर ।

जग करता साष्टांग।।

न यम, न नियम, न आसन, न  प्रत्याहार।

सब कुछ उल्टा पुल्टा ऊटपटांग।।

 

कैसे संसार में रह रहे हम ।

कैसी जाज्वल्यमान जिंदगी जी रहे हम ।।

कैसा है ये चाल चलन ये दस्तूर।

सत्य से होते जा रहे हम दूर ।।

 

सत्यध्न, सत्यभेदी, कलयुग है ये।

और क्या?

युगक्षय तक।

अधर्म सर्वोपरि ।।

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2 thoughts on “यथातथ्य

  1. दुनिया की असलियत यही है अनुचित कार्य करके भी लोग सम्मान के हकदार और ईमानदार बन रहे हैं ,कभीं कभीं तो लगता है लोग इतना गिरगिटिया दिखावा करके थकते क्यों नहीं हैं , प्यार इत्यादि जैसे भाव खोते जा रहे हैं इसके पीछे कारण है संवेदनहीनता और छल छद्मावरण !

    आपकी कविता, आपके भाव और आपकी स्वभाविकता कहीं और प्राप्त कर पाना असंभव है, कहने को तो असंख्य कवि हैं पर ऐसी कविता कौन कर पाता है , आपकी कविता ऐसे ही हमसब का ज्ञानसंचार करती रहे यही कामना है, कविता बहुत अच्छी लगी मुझे !

    • कविता पसंद करने के लिए आप का धन्यवाद, कविता सामयिक है जैसा अपने लिखा और कवि भी प्रेरणा सामयिक प्रसंगों से ही लेते हैं

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