चिकित्सकों से दुर्व्यवहार, दुखद

बहुत दिनों से दोस्त पीछे पड़े हैं कह रहें हैं की वर्तमान में इतना कुछ घटित हो रहा है उस पर कुछ लिखिए। लेखनी में बहुत दम होता है, शायद लोग पढ़ के प्रभावित हों, दिल बदले, और शायद कुछ हो जाये। कल भी एक पत्रकार मित्र का फ़ोन आया उसने भी बहुत उकसाया, लेकिन मेरा दिल है की मानता ही नहीं। कुछ साल पहले मैंने अपने आप से एक वायदा किया था की राजनीति से प्रेरित हो कुछ न लिखूंगा। कुछ ऐसा भी न लिखूंगा जिससे किसी को चोट पहुंचे। अब अगर आप वर्तमान घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया लिखेंगे तो किसी न किसी को तो बुरी लगेगी ही। आस पास इतना कुछ हो रहा है जिसको देख सुन के रोज़ दिल में एक टीस उठती है, एक काँटा चुभता है, पर मैं हूँ की दिल मसोस के रह जाता हूँ सोचता हूँ की इस पर प्रतिक्रिया जरूर देनी चाहिए पर ….भावावेश में आ कर कभी कोई कदम नहीं उठाना चाहिए शायद इसी लिए नहीं लिखता।

तीन साल काशी हिन्दू विश्विद्यालय से दूर रहा। वाराणसी वापस आये अभी मुझे जुम्मा जुम्मा छह हफ्ते हुए हैं। इन छह हफ़्तों में इतना बदलाव देखा है की दिल रो उठता है, काशी हिन्दू विश्विद्यालय से इतना लगाव जो है। काशी हिन्दू विश्विद्यालय मेरी मातृ संस्था है जहाँ मैंने अपने जीवन के सबसे खूबसूरत और खट्टे मीठे पल बिताये हैं। यह जुडाव करीब इक्कतीस सालों का होने आया है। इस संस्थान ने मुझे अनगिनित दोस्त दिए, मुझे जीविका दी, तरक्की का मार्ग दर्शया ही नहीं उस पर सरपट दोड़ाया। मुझे एक अच्छा शल्य चिकित्सक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज जब मैं बदलाव देखता हूँ तो दिल में उमंग उठने की जगह आवेश उठता है। छह हफ़्तों में दो बार चिकित्सालय में चिकित्सकों के साथ मारपीट के बाद हड़ताल। ऐसा नहीं है की पहले ऐसा नहीं होता था, परन्तु तब की घटनाओं और आज की घटनाओं में जमीन आसमान का अंतर है। और इस सारे घटनाक्रम में परेशान वो मरीज होते हैं जो बहुत उम्मीद के साथ बी एच यू आते हैं और जिनका इन सब घटनाओं से कुछ लेना देना नहीं होता। आज के अख़बारों में छपी तस्वीरें ह्रदयविदारक हैं और हमें सोचने समझने पर मजबूर करतीं हैं। मैं अपने आप को लिखने से नहीं रोक पाया हालाँकि मैंने बहुत संभल के लिखने का प्रयास किया। दिल खोल के लिखने पे पाबंदी जो है, स्वयं लगायी पाबंदी।

मुझे लगता है की बिना कुछ लिखे मैंने बहुत कुछ लिख दिया, पूरी उम्मीद है की पाठकों को बिना लिखे भी मेरे विचार समझ आये होंगे। मैं अनुशासन में रहने का प्रयास कर रहा हूँ आत्मसंयम को व्यवहार में लाने की कोशिश कर रहा हूँ, डर है की अन्दर छिपा “मोटर” फिर बहार न आ जाये….। अगर लेखनी और लेखन शैली पसंद आई तो आने वाले समय में वर्तमान परिपेक्ष एवं घनाक्रमो पर और लिखूंगा। निरंतर लिखता रहूँगा। आप की प्रतिक्रियाएँ बहुमूल्य हैं, घटनाक्रम एवं लेखनी दोनो पर, उन्हें बेहिचक आने दीजिये। अंग्रेजी अनुवाद कुछ समय बाद।

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12 thoughts on “चिकित्सकों से दुर्व्यवहार, दुखद

  1. वाह , तो धाराप्रवाह लिखी बातों को पढ़कर बरबस ही निकल आया , आज माँ को हृदय रोग विभाग में दिखाने लेकर जाना था मुझे लगा कि आज कैसे दिखा पाऊंगी , पर भला हो डाक्टर साहब का जो आज भी ड्यूटी पर आये हुए थे और अपने कमरे में ही उन्होंने माँ को देखा , पर भीड़ काफी कम या न के बराबर थी , सचमुच मरीजों को ऐसे मामले में परेशानी उठानी पड़ती है पर उनकी परेशानी के बारे में आप जैसे अच्छे चिकित्सक ही सोच पाते हैं , मेरी अपनी बात बताऊं तो चिकित्सकों के प्रति मेरे मन में बड़ा आदर भाव रहता है, और उनसे सम्बन्धित किसी विवाद की स्थितियों से मुझे बहुत कष्ट होता है —

    सर आप जो लिखेंगे वह निःसंदेह बहुत प्रभावी होगा अतः जरूर लिखें , और हिन्दी में जरूर लिखें (अंग्रेजी अनुवाद के लिए आपका जैसा भी निर्णय हो)

  2. वाह , तो धाराप्रवाह लिखी बातों को पढ़कर बरबस ही निकल आया , आज माँ को हृदय रोग विभाग में दिखाने लेकर जाना था मुझे लगा कि आज कैसे दिखा पाऊंगी , पर भला हो डाक्टर साहब का जो आज भी ड्यूटी पर आये हुए थे और अपने कमरे में ही उन्होंने माँ को देखा , पर भीड़ काफी कम या न के बराबर थी , सचमुच मरीजों को ऐसे मामले में परेशानी उठानी पड़ती है पर उनकी परेशानी के बारे में आप जैसे अच्छे चिकित्सक ही सोच पाते हैं , मेरी अपनी बात बताऊं तो चिकित्सकों के प्रति मेरे मन में बड़ा आदर भाव रहता है, और उनसे सम्बन्धित किसी विवाद की स्थितियों से मुझे बहुत कष्ट होता है —

    सर आप जो लिखेंगे वह निःसंदेह बहुत प्रभावी होगा अतः जरूर लिखें , और हिन्दी में जरूर लिखें (अंग्रेजी अनुवाद के लिए आपका जैसा भी निर्णय हो)

  3. वाह , तो धाराप्रवाह लिखी बातों को पढ़कर बरबस ही निकल आया , आज माँ को हृदय रोग विभाग में दिखाने लेकर जाना था मुझे लगा कि आज कैसे दिखा पाऊंगी , पर भला हो डाक्टर साहब का जो आज भी ड्यूटी पर आये हुए थे और अपने कमरे में ही उन्होंने माँ को देखा , पर भीड़ काफी कम या न के बराबर थी , सचमुच मरीजों को ऐसे मामले में परेशानी उठानी पड़ती है पर उनकी परेशानी के बारे में आप जैसे अच्छे चिकित्सक ही सोच पाते हैं , मेरी अपनी बात बताऊं तो चिकित्सकों के प्रति मेरे मन में बड़ा आदर भाव रहता है, और उनसे सम्बन्धित किसी विवाद की स्थितियों से मुझे बहुत कष्ट होता है —

    सर आप जो लिखेंगे वह निःसंदेह बहुत प्रभावी होगा अतः जरूर लिखें , और हिन्दी में जरूर लिखें (अंग्रेजी अनुवाद के लिए आपका जैसा भी निर्णय हो)

  4. एक आग्रह है कि मृत्युंजय के लिए भी लिखें एक कविता 🙂

  5. सर आपने मेरे निवेदन को गौरवपूर्ण बना दिया है , आपने हमें एक मृत्युंजय नामक महत्वपूर्ण ग्रुप दिया है , धन्यवाद सर

    • फेसबुक के ग्रुप का इस पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है, कृपया ग्रुप से सम्बंधित पोस्ट यहाँ न करे

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