हिंदी दिवस पर विशेष

a026आज हिंदी दिवस है, हर साल आता है, इसमें नया क्या है? गत वर्ष भी आया था, मैं तब भोपाल में था जहाँ हिंदी दिवस के उपलक्ष में हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया था। जाहिर है की मैं भी वहां गया, आखिर कोई बुद्धिमान व्यक्ति हिंदी के बड़े लेखको से मिलने तथा उनके सुविचार सुनाने के अवसर कभी  गवा सकता है क्या? नहीं न, तो मैंने भी मौके का सदुपयोग किया। कुछ घंटे एक पंडाल से दूसरे पंडाल में जा जा कर व्यतीत किये। कहीं प्रशासन में हिंदी तो कहीं हिंदी का अलख जगाने के उबाऊ भाषण, लेखक कम छुटभैये ज्यादा दिखे। लेकिन लग्न एवं भाषा के प्रति प्रेम देख ऐसा लगा की अगले  दो तीन दिन में पूरा देश हिन्दीमय हो जायेगा। देश में सारे कामकाज हिंदी में होंगे, जिनको हिंदी नहीं आती उनको दुभाषिये दिए जायेंगे, हर कार्यालय में एक हिंदी अधिकारी होगा, सरकारी कामकाज हिंदी में करने के लिए अनुवादक दिए जायेंगे। सुनकर लगा की मैं तो बेकार में ही आ गया, पूरा देश तेयारी में है मेरे योगदान की कोई जरूरत नहीं, हिंदी की तो चल निकली। मन भर आया, पेट में कुलबुली होने लगी, तो एक बड़े पंडाल में जा चाय समोसा उड़ा आया। लेखक नहीं दिखे तो एक मित्र से कहा की दोस्त इतने बड़े बड़े हिंदी के साहित्यकार आये हैं वो कहाँ हैं? मित्र ने तुरंत बिना समय गवाए शाम को दावत में आने का न्योता दे दिया, बोला दोस्त शाम को आओ असली महफ़िल तो वहीँ जमेगी, जब तक दो ग्लास न उतर जाएँ गले के नीचे, गला तर न हो जाये, भाषा का असली ज्ञान बाहर नहीं आता। मैं भी मन मसोस के रह गया, क्या करता शाम तो कभी खाली मिलती ही नहीं थी। प्रस्ताव प्रलोभक था मगर ….. हाय मजबूरियां। गवां दिया। हिंदी लेखन के ज्ञान की बत्ती जलने से पहले ही बुझ गयी। मेरे अन्दर का साहित्यकार उदास हो गया। लेकिन लेखनी ने हार नहीं मानी और में लिखता गया, पढ़ा शायद ही किसी ने पर साहित्य वैसे भी कौन पढता है। लिखने की तो एक सनक है, उन्माद उठा और कलम चली, हिंदी लेखनी कौन पढता है। बच्चे पाठ्य क्रम की किताब नहीं पढ़ते तो ….. । हिंदी साहित्य क्या होता है शायद पढ़ाने वालों को भी पूरी तरह नहीं मालूम। बहु प्रयोजनीय अध्यापको का जमाना जो है। सरकारी स्कूल में तो एक ही अध्यापक सारे विषय पढ़ता है। बैंगन की जगह आज तो सोच सोच के भेजे का भुर्ता बन गया ।

चलिए, आज उस घटना को पूरा एक वर्ष हो गया, किन्तु प्रसंग आज भी बिलकुल ताजा है। इतना ताजा की जैसे कल ही घटित हुआ हो। हिंदी बेचारी आज भी उतनी ही लचर है जितनी कल थी। उत्थान का तो पता नहीं शायद पतन और हो गया। हिंदी भाषी राज्यों को छोड़ दें तो शायद ही कोई इसका इस्तेमाल करता हो। और करे भी क्यों जब अंग्रेजी भाषा पढ़ के पूरे विश्व में काम चल जाता है, तो इसे सीख समय क्यों बर्बाद करें। हिंदी भाषी राज्यों में भी अंग्रेजी मूल बोलचाल की भाषा हो चुकी है। स्कूल भी अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाते हैं। कक्षा में हिंदी बोलने पर दंड का प्रावधान है, और तो और अब तो हिंदी पढने में लोगो को शब्दकोष देखने पड़ते हैं। ऊपर से तुर्रा ये, कि यार इतनी कलिष्ट हिंदी क्यों लिखते हो? आमजन की भाषा में लिखो। समझ नहीं आता की कब से हिंदी भी दो हो गई विशुद्ध और अशुद्ध। समझ नहीं आता की हालात पर हँसू या रोऊ। एक अच्छे खासे हास्यवादी से निरंतर निराशावादी बनता जा रहा हूँ, लगने लगा है की मेरी पीढ़ी के साथ भाषा का भी अंत हो जायेगा। और भाषा का अंत समाज का अंत होता है, राष्ट्र का अंत होता है। यह कौन समझेगा और कौन अगली पीढ़ी को समझाएगा। कौन पढ़ेगा मेरी लेखनी के इन पन्नो को? कहीं काला अक्षर भैंस बराबर तो नहीं हो जायेगा?

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