लोकतान्त्रिक साम्यवाद (Democratic communism)

नोट बंदी को आज पूरे १५ दिन हो गए। इन १५ दिन में वो सब देख लिया जो पूरी जिन्दगी नहीं देखा था। लोकतान्त्रिक देश में रहते हुए साम्यवाद के पूरे मजे उठा लिए। एक झटके में गरीबी को दूर होते देख लिया। इस समय श्रीमती इंदिरा गाँधी जी की बहुत याद आई। आप ने गरीबी मिटाओ का नारा दिया लेकिन जो आप नहीं कर पाई वो हमारी चुनी हुई सरकार ने एक झटके में कर दिया।

आज न्यूज़ देख पता चला की जन धन खातो में भी २१००० करोड़ जमा हो गए। एकाएक ऐसा लगा कि इस देश में गरीब थे ही नहीं, वो इसलिए गरीब दिखते थे की वो अपना पैसा बैंक में नहीं जमा करते थे। आज जैसे ही सरकार ने नोटबंदी का ऐलान किया और देखो नोट बैंक में आ गए। अब मैं ये मान के चल रहा हूँ की किसी भी खाते में २.५ लाख से ज्यादा नहीं आये होंगे। चलो कम से कम कुछ करोड़ लोग और लखपति हो गए। जमीन में गडा धन बैंकों में आ गया। मेरी दादी बताती थीं की उनकी मां ने घड़ा भर सिक्के कहीं गाड़ दिए थे। अंग्रेजो के जमाने के सिक्के। उत्सुकतावश हम ये पूछते नहीं थकते थे की क्या किसी ने उस गड़े धन की खोज नहीं की । दद्दू को पता था या नहीं, दद्दू ने कहाँ कहाँ खोदा इत्यादी। तब की तो ठीक थी भैया उस ज़माने में बैंक नहीं होते थे पर अब तो हैं तो फिर आप अपने पैसे की कब्र क्यों खोदते हैं? चलो गड़े मुर्दे उखड कर बैंक पहुँच गए। काले सफ़ेद का गरीब अमीर का फर्क मिट गया।

भगवान् की तो किस्मत खुल गयी। मंदिर, मस्जिद, गिरजो में तो इतना पैसा आया की गिनने के लिए मशीने लगनी पड़ी। घर के बगल वाले मंदिर के पंडित जी पूछने लगे की भैया इन १०००/५०० के नोटों का क्या करें। मैंने कहा की भगवान् का खाता खुलवाओ और जमा करो। पंडित जी बोले की भैया अब आधार कार्ड कहाँ से लायें। भगवान् को कहाँ से पकड़ कर लायें बॉयोमैट्री करने के लिए। मैंने कहाँ ढूँढो ३३ करोड़ देवी देवताओं में कोई तो मिलेगा और सोचो ३३ करोड़ खातों में २.५ लाख के हिसाब से कितना जमा कर सकते हो। हिसाब लगा पंडित जी की तो बांछे खिल गयी बोले भैया हमारे पूर्वज कितने चतुर थे। मैंने पुछा कैसे? पंडित जी बोले भैया हमारे पूर्वजो के पास दिव्यदृष्टि थी उन्हें पता था की वर्ष २०१६ में एक महापुरुष आएगा और सरकार के माध्यम से नोटबंदी करेगा और हमारे पास जितने देवी देवता होंगे उतने खाते खुल सकेंगे उतना पैसा सफ़ेद हो जायेगा। तो उन्होंने ३३ करोड़ खोज निकले। पेड़, पहाड़, बादल, आग, हवा, पानी, सब को भगवान् बना दिया अब महापुरुष इन सब के आधार कार्ड बनवाये। सब के खाते खुलवाये और हम लोग उसमे जमा करे।

पंडित जी को धन्यवाद दे आगे चले तो देखा देश के कुछ नौजवान अपनी ऊँगली पे लगी स्याही दिखा सेल्फी ले रहे थे। उत्सुकतावश पूछा की भाई कौन चुनाव में वोट दे कर आये हो। चुनावी माहोल तो अभी गरमा रहा है और चुनाव की सुचना तो अभी आई नहीं है। एक सज्जन ने बताया की २००० रुपये बदलवा कर आ रहे हैं। पता चला की प्रजातान्त्रिक देश में साम्यवाद आ गया, बैंक से भीड़ कम करने के लिए हमारी जनतांत्रिक सरकार ने आर्थिक साम्यवाद लगा दिया है। अब सरकार बताएगी की कितना रखो, कहाँ रखो, कितना निकालो, उसका क्या करो। सब्जी वाले से पूछो की भैया तेरा खाता है की नहीं यदि है तो चेक से गोभी के २० रुपये ले। फिर दो दिन बैंक में लाइन लगा उसे निकाल। हफ्ते में दो दिन तो तू छुट्टी ले ही ले। सरकार नहीं चाहती की तू हफ्ते में ७ दिन १२ घंटे काम करे। पत्नी को बताया की ठेले पर गोलगप्पे खाने पर भी रोक लगने वाली है, अब ठेले वाला कार्ड लेगा नहीं और जहाँ कार्ड चलता है वहां गोल गप्पे में मजा नहीं आएगा। समझ नहीं आ रहा की ये लोकतान्त्रिक साम्यवाद क्या है?

सोचा चलो घर लौट चलूँ। चौराहे पर पहुंचा तो देखा वर्दी वाले भैया वसूली में लगे थे, ट्रक वाले से नो एंट्री में आने का, मोटर साइकिल वालो से हेलमेट नहीं लगाने का, सड़क पर ठेला लगाने का, कार वालो से सीट बेल्ट का, टेम्पो से ५ बैठाने का, ट्रेक्टर ट्राली में ईटा रेत ले जाने का इत्यादी। चलो यहाँ तो भ्रस्टाचार बंद हुआ नहीं सिर्फ नोट बदल गए। इतनी मुशक्कत के बाद निकाले गए नोट फिर भ्रस्टाचार में। अब बिचारे वो भी क्या करें शाम को बंधा आगे पहुचाना जो है। देश बिलकुल वैसे ही चल रहा है जैसे ८ नवम्बर से पहले चलता था।

सोच सोच परेशान हुआ की भाई आखिर क्या बदल गया? पक्का आतंकवादी हमले तो कम हुए ही होंगे। जाली नोटों का कारोबार जो बंद हो गया है। घर पहुँच न्यूज़ देखी तो दिल दहल गया, दिल भर आया। सेना के जवान फिर शहीद हो गए, आतंकवादियों के पास २००० के नए नोट मिले। लो यह भी नहीं बदला। आम आदमी को तो २००० का नोट अभी छूने को नहीं मिला और आतंकी उसे ले के घूम रहे हैं। भैया उनका तंत्र उनका फैलाव कितना गहरा है और हम ये सोचते हैं की साम्यवाद आयेगा और सब ठीक हो जायेगा। सब देख, सिर्फ एक ही चीज समझ आई की भैया करेंसी नहीं सोच बदलनी पड़ेगी। ये जनतांत्रिक साम्यवाद देश भक्ति को जन्म नहीं देगा। परवरिश, शिक्षा,बाबु, अधिकारी और वातावरण बदलो, नैतिकता को जन्म दो, देश अपने आप बदल जायेगा। जय हिन्द ।

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One thought on “लोकतान्त्रिक साम्यवाद (Democratic communism)

  1. सर लेख बहुत ही अच्छा है , दादी की मम्मी के घड़े के सिक्के की तलाश का मन कर रहा है , मुझे पता चल जाय तो ढ़ूंढ़ निकालूँ , और उसका क्या करूँगी ये आपको बाद में बताऊँगी , और पंडित जी को बोलें कि ५००/१००० की नोट भगवान के तरफ से हमारे ऐसे खाते में डलवा दें जिससे उस खाते के माध्यम से जरूरत मंद लोगों को मदद दी जा सके

    मुझे समसामयिक नोटबंदी की समस्या पर आपके द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले एक सारगर्भित विचार का इंतज़ार था
    पढ़ कर काफी अच्छा लगा

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