गधों पर राजनीति

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राजनितिक जुमलेबाजी अपनी परकाष्ठा पर पहुंची और गधों पर राजनीति होने लगी׀  बेचारे गधे, अब तो लगने लगा है की जैसे गधा होना कोई अपराध हो ׀ अब कोई गधा अपनी मर्जी से तो गधा नहीं बनता ׀ सब घोड़े बनना चाहते हैं, तेज भाग सबसे आगे निकलना चाहते हैं पर ऐसा हो नहीं सकता, बोझ उठाने के लिए भी तो कोई चाहिए, इसलिए गधा समाज के लिए जरूरी है ׀

आप कहेंगे की समाज बदल रहा है साइंस ने प्रगति की है अब बड़ी अश्व शक्ति वाले उन्नत साधन उपलब्ध हैं तो गधे पर लदाई क्यों ? अब तो इसरो भी बैलगाड़ी पर उपग्रह नहीं ढोता, उन्हें भी बढ़िया गाडी मिल गयी है तो आप अभी भी क्यों गधों के पीछे पड़े हैं׀ उन्हें भी उन्मुक्त वातावरण में खुल के सांस लेने दे ׀ जंगलो मैं उन्मुक्त विचरण करने दे ׀ परन्तु आप को उसमे भी ख़ुशी नहीं, की गधा क्योंकर मुक्त हो गया ? कच्छ के अभ्यारण को फिर युद्ध का मैदान बनाने की तैयारी है ׀

कृष्ण, सिकंदर, विक्रमादित्य, गजनी, खिलजी, कच्छ का बटवारा और १९६५ की लड़ाई सब यहीं हुआ, यहाँ जो जीता उसने हिंदुस्तान पर राज किया ׀कच्छ में चक्रवात भी आये और भूकंप भी लेकिन फिर भी जंगली गधे वहीँ बने रहे ׀ अब एक बार फिर कच्छ पर राजनितिक युद्ध शुरू हुआ है देखना है कौन इसे जीतता है ׀ पर इस बार ये युद्ध जमीन पर नहीं, बिचारे गधो पर लड़ा जा रहा है ׀पंचतंत्र की कहानियों पे पला बढ़ा आम भारतीय हमेशा जानवरों से ही प्रेरणा लेता है ׀ राजनीति में अभी तक हाथी, शेर, गिद्द, कुत्ते ही थे अब गधो ने जोरदार प्रवेश किया है ׀ लोमड़ी और उलूक प्रतीक्षा में है और चर्चा है कि वो भी जल्द भारतीय राजनिति में प्रवेश करेंगे ׀

लेकिन भाई अपमान की भी कोई हद होती है ׀ कोई सिर्फ गधा कहता तो चलता पर कहा भी तो “भारतीय जंगली गधा” यह तो घोर अपमान की बात है एक भारतीय, दो जंगली, और उपर से तीसरा गधा ׀ घोर अनादर ׀   माना हम भारतीय कानून का पालन नहीं करते, न हम हेलमेट लगते हैं न सीट बेल्ट, जहाँ देखो वहां थूक देते हैं, कचरा फैलाते हैं खुले में शौच करते हैं, पर न तो भारत जंगल है और न हम भारतीय जंगली गधे ׀ माना कूड़ेदान, पीकदान नहीं हैं, शौचालय नहीं है, सड़के नहीं हैं, बिजली नहीं हैं, खाने को नहीं हैं, अगर चीन नहीं होता तो मोबाइल क्रांति भी न आती, किन्तु परन्तु, भाई अपमान तो न करो, मजबूरी समझो ׀ कितनी देर रोक कर रख सकते हैं ? अगर रेगिस्तान में पानी होता तो गधा क्यों नहीं नाहता ? समझिये इस भारतीय जंगली गधे से शिक्षा लेने की जरूरत है ׀

आप ये सोच रहे होंगे की गधे से क्या शिक्षा मिल सकती है ׀ अरे जब सब जानवरों से शिक्षा मिलती है तो गधे से क्यों नहीं? गधा बोझ ढोता है लेकिन उफ्फ तक नहीं करता, घर से सीधा घाट और घाट से सीधा घर आता है, इधर उधर नहीं देखता, दुःख हो या सुख, ख़ुशी हो या गम कभी चेहरे पर नहीं आने देता, हमेशा भावशून्य बना रहता है ׀ घोड़े का छोटा भाई है लेकिन कभी उससे प्रतिद्वंदिता नहीं रखता ׀ और विशेषकर याद रखने योग्य ये है कि जब उसे गुस्सा आता  है तो …… अपनी प्रसिद्ध दुल्लती जड़ देता है ׀ इसीलिए बैल के आगे और गधे के पीछे कभी खड़ा नहीं होना चाहिए ׀

गर्दभ और गंदर्भ में सिर्फ एक बिंदी का फर्क होता है और ये एक वोट की बिंदी गधे को देवता और देवता को गधा बना सकती है ׀ गधे का अनादर कर जो दुःख उसे दिया हैं तो कहीं ऐसा न हो की गुस्से में दुल्लती चले और आप “गधे के सर पर सींग” की तरह गायब हो जाएँ ׀

गदर्भ पुराण आगे भी जारी रहेगा

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4 thoughts on “गधों पर राजनीति

  1. 👏👏👏
    😃😁😂
    🐩🐦🐍🐴🐎🐫🐘🐢हो सकता है कल को इन पर भी राजनीति हो और आपके हाथों इनका भी नाम लिया जाय इसी प्रसन्नता और इंतज़ार में ये आपके सामने उपस्थित हुए हैं

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