आशंका

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रात गहराती जा रही थी

वो अभी तक घर नहीं पहुंची थी

घरवालो के चेहरों पर चिंताओं की रेखाए गहराने लगी थी

दिल में तरह तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थी

कहाँ रह गयी

रोज़ तो ६ बजे  तक आ जाती थी

यदि देर से आना होता था तो पहले बता जाती थी

आज तक कभी भी बिना बताये देर से नहीं आई थी

फिर आज क्या हो गया

क्यों नहीं आई है अभी तक

कितनी देर हो गयी है

नेहा अपने माँ बाप की इकलौती बेटी है,

पढाई पूरी करने के बाद उसने गुरुग्राम में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करना शुरू किया

पिछले पांच सालों से वो वहीँ कम कर रही थी

बहुत ही नियत जिन्दगी थी

सुबह पांच बजे उठाना और घर के कामो में लग जाना

माँ पिताजी को नाश्ता करा अपना टिफन बना काम पर ८ बजे निकल जाना

शाम को ६ बजे घर वापस आ शाम का खाना बनाना और रात्रि ९ बजते बजते थक कर चूर सो जाना

अगले दिन फिर वोही दिनचर्या

समय की इतनी पाबंध  की आप अपनी घडी मिला ले

बत्तीस साल की उम्र में कोई दोस्त नहीं

और यदि हों तो पता नहीं

वैसे दिनचर्या देख लगता नहीं था की उसका कोई दोस्त होगा

बहुत रूखी थी वो

या फिर हालत ने ऐसा बना दिया था

पूरी जिन्दगी माँ पिता के चारों और ही घूमती थी

पिताजी एक सरकारी विभाग में क्लर्क थे

एक इमानदार कर्मचारी

जिन्दगी में कभी किसी से कुछ नहीं लिया

जो कमाया बिटिया की पढाई में लगा दिया

माँ एक घरेलु महिला थी

पूरा समय धर्म कर्म में ही बिता देती थी

पड़ोसियों ने तो शायद कभी उनकी शक्ल ही नहीं देखि थी

बालकनी में कपडे सुखाने और तुलसी में पानी डालने जाना ही उनका घर से बाहर कदम रखने के बराबर था

दोनों की पूरी जिन्दगी बिटिया के इर्द गिर्द ही घूमती थी

नेहा भी बचपन से पढने में बहुत तेज थी

अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आती थी

सारे  अध्यापको की प्यारी थी वो

स्कूल में उसके दोस्त थे पर कोई भी शायद ऐसा नहीं जो उसे अच्छे से जनता हो

वो सबके साथ मीठा बोलती थी

परन्तु किसी से कभी कोई फालतू बात नहीं

स्कूल का कोई दोस्त भी शायद कभी घर आया हो

कॉलेज की पढाई उसने दिल्ली से की

वहां भी सुबह मेट्रो से जाना और शाम को वापस घर

कालेज में भी अकेली थी वो

जैसे उसे किसी की जरूरत ही नहीं थी

उसकी जिन्दगी अकेले ही चलती थी और वो भी बहुत अच्छे

फिर पिछले पांच सालों से वो ये नौकरी कर रही थी

घडी की सुइयों की तरह

दिनचर्या की पक्की

समय की पाबंध

पर आज

आज अभी तक घर क्यों नहीं आई

कितनी देर हो गयी है

बूढ़े माँ बाप अकेले घर में परेशान  हैं

जमाना बहुत ख़राब है

रोज ही किसी न किसी के साथ …

अभी कुछ दिन पहले ही तो महिला से जबरदस्ती कर उसके दुधमुहे बच्चे को मार डाला था

उससे कुछ दिन पहले मानेसर में हुआ था

और निर्भया, बेचारी उसका क्या कसूर था घर ही तो आ रही थी

देश में लगभग रोज ही कहीं न कहीं किसी न किसी के साथ बलात्कार होता है

और अब तो गैंग रेप भी बढे है

हाईवे पर परिवार के साथ भी लोग सुरक्षित  नहीं

कुछ भी कहीं भी हो सकता है

कहीं नेहा के साथ तो कुछ नहीं …..

शुभ शुभ बोलो ……

जवान बेटी अगर घर नहीं आती तो माँ बाप के दिमाग में तरह तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगती है

उनका भी क्या कसूर

जमाना कितना ख़राब हो गया है आज कल

देखो न कितनी रात हो गई

अभी तक घर नहीं आई

सावित्री ने अपने पति से कहा

सुनो जी

सात बज गए हैं नेहा अभी तक नहीं आई

आप फ़ोन क्यों नहीं करते

उससे पूछो तो क्या हुआ ? कहाँ है वो ?

देर क्यों हो रही है ?

सब ठीक तो है न

मेरा तो दिल उन्होनी की आशंकाओं से धड़क रहा है

दिल तो पिता का भी धक् धक् कर रहा था

पर हिम्मत जुटा रखी थी

अगर मैंने जरा सा भी तनाव दिखाया तो सावित्री और परेशान हो जाएगी

अभी सात ही तो बजा है

हो सकता है आज ऑफिस में देर हो गयी हो

या बस न मिली हो

कुछ देर और देख लो

आ जाएगी

आप को फ़ोन लगाने में क्या दिक्कत है

मोबाइल होते किस लिए हैं

लगाइए न

अरे वो अभी सिर्फ एक घंटा देर से है सिर्फ सात बजे हैं कोई पहाड़ नहीं टूट गया

धीरज रखो

आ जाएगी

पर सावित्री वो तो माँ हैं न

और माँ का दिल

ज्यादा तेज धड़कता है

और खटका तो उसे हमेशा लगा रहता है

माँ का दिल कमजोर होता है न

और ऊपर से पत्रकार

सारा दिन टीवी और अख़बारों मैं दहशत फैलाते रहते हैं

पर उनका क्या दोष है

समाज का इतना पतन हो गया है

छोटे छोटे बच्चे बलात्कारी हो गए हैं

और बिचारे उनके माँ बाप

उनका दर्द कोई समझ सकता है क्या

जवान लड़की जब घर से बाहर हो तो माँ के लिए सूरज छुपते ही रात हो जाती है

पूरी जिन्दगी अपना सुख दुःख भूल जो बच्चो को बड़ा करता है

अपना पेट काट बच्चो को अच्छी शिक्षा देता है

उन्हें कुछ बनता देख खुश होता है

और अगर औलाद अकेली हो

तो बूढ़े माँ बाप के दिल को कौन समझा सकता है

और वो भी अगर लड़की नेहा हो

कोई एब नहीं कोई रूचि नहीं

अपने ज़माने की लड़कियों से पूर्णतया भिन्न

जहाँ आज कल की लड़कियां पूरी रात माँ बाप की आँखों में धूल झोंक मदिरालयों और डिस्को में लडको के साथ नाचती रहती हैं वहीँ नेहा इन सब से कोसो दूर

आजकल की लड़कियां

बाप रे बाप

इनकी राते काली नहीं रंगीन होती है

शराब से तो बिलकुल परहेज नहीं लडको से ज्यादा, शायद प्रतिद्वन्दता में

या फिर लडको से प्रतिस्पर्धा

हम किसी से कम नहीं शायद

कोई लिंग भेद नहीं

कपडे भी देखो

कैसे कैसे पहनती हैं बिलकुल न के बराबर या फिर ऊटपटांग

कोई हया कोई शर्म कुछ नहीं

पर सब ऐसी नहीं हैं

अपनी नेहा को ही ले लो

पवित्रता की प्रतिमा है

सावित्री फिर अपने पति से बोली

सुनते हो

एक फ़ोन तो लगाओ

अब तो आठ बजने को है

दिल तो पतिदेव का भी जोरो से धड़क रहा था

पर कमजोर जो नहीं दिखना चाहते थे

पर पत्नी के आगे कितनी देर चलती उनकी

उन्होंने फ़ोन उठाया और नेहा का नंबर लगाया

दूसरी तरफ से एक चिरपरिचित आवाज आई

“आप के द्वारा डायल किया गया नंबर अभी पहुँच से बाहर है कृपया पुन: प्रयास करे”

अब तो दौनो को मनो जैसे काटो खून नहीं

सावित्री के दिमाग में तो तरह तरह की आशंकाएं कौंध गयी

पतिदेव भी कुछ परेशान से दिखने लगे

बोले

ऑफिस फ़ोन लगाता हूँ

और उन्होंने ऑफिस का नंबर डायल किया

बहुत देर तक घंटी जाने के बाद किसी ने उसे नहीं उठाया

अब तो दोनों परेशान

समझ नहीं आ रहा था की क्या हुआ

क्या करें

कहाँ होगी नेहा ?

सावित्री बोली

आप ईशा को फोने लगाओ

वो तो नेहा के साथ ही काम करती है और मैहरोली तक उसके साथ ही आती है

उससे पूछो की वो कहाँ है और नेहा उसके साथ तो नहीं है

पिता जी ने अब कांपते हाथो से ईशा को फोन लगाया

घंटी तुरंत चली गयी

पिता जी की दिल की धड़कन बढ गई

चौथी घंटी जाने के बाद ईशा ने फोन उठाया

hellहेल्लो

हाँ बेटी ईशा

जी अंकल

बेटी नेहा अभी तक घर नहीं आई है

तुम्हारे साथ है क्या ?

नहीं अंकल वो तो मेरे ही साथ साढ़े पांच बजे ऑफिस से निकली थी और मैहरौली तक मेरे साथ आई थी

मैं सवा छह बजे घर पहुंची हूँ

आप ने नेहा को फोन किया क्या ?

हाँ पर वो कवरेज छेत्र से बाहर आ रहा है

आप फिर कोशिश करो अंकल कोई नेटवर्क प्रॉब्लम होगी

मैं भी कोशिश करती हूँ

अगर बात होती है तो आप को बताती हूँ

अब तो दोनों को काटो तो खून नहीं

सांप सूंघ गया हो जैसे

दिमाग ने काम करना बंद कर दिया

मैहरोली तक साथ थी

वहां से साकेत तक तो कुल 15 मिनट लगते हैं

अब दो घंटे होने को हैं

कहाँ है नेहा ?

दुबारा फोन लगता हूँ

कह कर पिता जी ने नेहा का नंबर मिलाया

दूसरी तरफ से फिर चिरपरिचित आवाज आई

“जिस नंबर से आप संपर्क करना चाहते हैं वो अभी बंद है कृपया पुन: प्रयास करें”

सावित्री का तो दिल धडकना लगभग बंद हो गया

मैहरोली तक तो ईशा के साथ आई है

फिर कहाँ चली गयी

फ़ोन क्यों बंद है

कहाँ रह गयी है

क्या पुलिस को फोन करें

अस्पतालों में फोन कर पूछे

कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयी

टीवी चालू कर न्यूज़ देखो

कहीं कुछ हुआ तो नहीं

कहीं आतंकवादियों ने तो कुछ नहीं कर दिया

मेट्रो में घुसना तो आसान है कोई सुरक्षा नहीं है कोई भी टिकेट ले घुस सकता है

रोज कहीं न कहीं आतंकी हमले हो रहे है

और हमारी कानून व्यवस्था तो बिलकुल लचर है

अभी इंग्लैंड में हुआ था उससे पहले पेरिस में

यहाँ भी रोज कहीं न कहीं कुछ न कुछ होता रहता है

कोई आन्दोलन भी हो सकता है

रोज होते हैं कभी इनके कभी उनके

और सबसे पहले यातायात से साधनों को ही नुक्सान पहुचाते हैं

रेल और सड़क रोक लेते हैं

कहीं ऐसा ही तो कुछ नहीं हुआ

पता नहीं कहाँ फसी होगी नेहा

किस हाल में होगी

भगवान् भली करें

भली ही करेंगे

बिचारी नेहा ने किसी का क्या बिगाड़ा है

सावित्री अब पूरी तरह से घबरा गयी थी

टीवी के चैनल बदल बदल के देखना शुरू कर दी थी

पिता जी फ़ोन ले के बार बार नेहा का नंबर लगा रहे थे

फोन अभी भी नेटवर्क से बाहर  था

आशंकाएं अब खौफनाक हो चली थी

संत्रास बढ़ता जा रहा था

तभी दरवाजे की घंटी बजी

सावित्री ने दौड़ के दरवाजा खोला

दरवाजे पर नेहा थी उसके चेहरे पर उदासी थी जैसे बस अभी रो देगी

पर सावित्री की ख़ुशी का ठिकाना न था

उसने झपट कर नेहा को गले लगा लिया

और दोनों रोने लगी

शब्दाभाव

इति

 

 

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