“गर्मी”

ऊष्म या गरमी के प्रमुख अर्थ निम्नलिखित हैं

  1. उष्णता । ताप । जलन ।
  2. तेजी । उग्रता । प्रचंडता ।
  3. आवेश । क्रोध । गुस्सा ।
  4. उमंग । जोश ।
  5. ग्रीष्म ऋतु । फागुन से जेठ तक
  6. छूत का रोग – इस रोग में गुप्त इंद्रिय से एक प्रकार का चेप निकलता है, जिसके लग जाने से यह रोग एक दूसरे को हो जाता है ।
  7. पित्त – शीतोष्णे चैव वायुश्च त्रयः शारीरजाः गुणाः अङ्गत्वम्, ˚मलत्वम् परि- धेर्मुक्त इवोष्णदीधितिः
  8. ज्वर की जलन । बुखार की गर्मी को “आधिमन्यु” और “प्रज्वार” कहा गया है
  9. सूर्य की गर्मी को “प्रतप”
  10. असाधारण गर्मी को उपतप्ता कहते हैं
  11. संस्कृत में गर्मी को तपति, उष्ण और आतप कहते हैं “नाथति सुरति नाधते तप्यते तपति सुवति इष्टे सौति” “उष्णः, पुं, (उष दाहे + “इण्षिञ्जिदीङुष्यविभ्योनक्’ । ३ । २ । इति उणादिसूत्रेण नक् ।) ग्रीष्मऋतुः । तत्पर्य्यायः । ग्रीष्मः २ उष्मकः ३ निदाघः ४ उष्णो- पगमः ५ उष्णागमः ६ तपः ७ । इत्यमरः ॥“

आतपः, पुं, (आङ् + तप + अच् ।) रौद्रं । तत्पर्य्यायः । प्रकाशः २ द्योतः ३ । इत्य- मरः ॥ दिनज्योतिः ४ सूर्य्यालोकः ५ दिनप्रभा ६ रविप्रकाशः ७ प्रद्योतः ८ तमारिः ९ तापनः १० द्युतिः ११ । अस्य गुणाः । कटुत्वं । रूक्षत्वं स्वदमूर्च्छातृष्णादाहवैवर्ण्यजनकत्वं । नेत्ररोगप्रको- पनत्वञ्च ॥ इति राजनिर्घण्टः ॥

  1. छतरी को संस्कृत में “आतपत्रम्”, क्ली, (आतप + त्रै + कः) छत्रं और तमातपक्लान्तमनातपत्रम् भी कहते हैं

“उष्णे हैमे वसन्तेच कामं ग्रीष्मे तु शीतलम्” । क्वचित् क्लीवलिङ्गान्तोऽपि दृश्यते । यथा महाभारते संवर्त्तमरुत्तीये ।

साहित्य में शब्द का प्रयोग

मुचि मुचि गरम भर्इ किन बाझ। बुड़भुज रूप फिरै कलि मांझ।

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥

मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥

जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥

 

“नोष्णं न शिशिरस्तत्र न वायुर्न च भास्करः” । अग्निः । सूर्य्यः । यथा, मनुः

“उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम्” । (“उष्णे आदित्ये मेघे च वर्षति” इति तट्टीकायां कुल्लुकभट्टः ॥) पलाण्डुः । इति राजनिर्घण्टः ॥ उष्णवीर्य्यद्रव्यगुणाः । पित्तबलकारित्वम् । लघु- त्वम् । वातश्लेष्मनाशित्वच्च । इति राजवल्लभः ॥

उष्णः, त्रि, (उष् + नक् ।) निरालस्यव्यक्तिः । तत्प- र्य्यायः । दक्षः २ चतुरः ३ पेशलः ४ पटुः ५ सूत्थानः ६ । इत्यमरः । अशीतः । इति मेदिनी ॥ (यथा मनुः । ३ । २३७ । “यावदुष्णं भवत्यन्नं यावदश्नाति वाग्यतः” ॥)

समानार्थक:ऊष्मक,निदाघ,उष्णोपगम,उष्ण,ऊष्मागम,तप

निदाघ उष्णोपगम उष्ण ऊष्मागमस्तपः। स्त्रियां प्रावृट्स्त्रियां भूम्नि वर्षा अथ शरत्स्त्रियाम्.।

दक्षे तु चतुरपेशलपटवः सूत्थान उष्णश्च। चण्डालप्लवमातङ्गदिवाकीर्तिजनङ्गमाः॥

उष्णोऽपि घर्मचेष्टालङ्कारे भ्रान्तौ च विभ्रमः। गुल्मारुक्स्तम्बसेनाश्च जामिः स्वसृकुलस्त्रियोः॥

स्त्रीणाम्_श्रृङ्गारभावजाः_क्रिया, मुखादिविकासः, अपाङ्गदर्शनचेष्टा, अभिप्रायानुरूपचेष्टा

सूतके मृतके चैव नस्नायादुष्णवारिणा” स्मृतिः

“आददे नातिशीतोष्णः नभस्वानिव दक्षिणः” रघुः

“अभीक्ष्णमुष्णैरपि तस्य सोष्मणः”

“म्लापयन्नभिमानोष्णैर्वनमालां सुखानिलैः” माघः

तापेपु॰ मुष्णन्तमुष्णं ततिभिस्तरूणाम्” माघः

“उष्णं तापम्” मल्लि॰। तत्र ग्रीष्मस्य सूर्य्यतापाधिक्यवत्त्वात् उष्णत्वम्

“ग्रीष्मातीव्रकरोभानुर्न हेमन्ते तथाविधः” इति मयप्रश्ने

“अत्या सन्नतया तेन ग्रीष्मेतीव्राः कराः रवेः। देवभागे-ऽसुराणान्तु हेमन्ते मन्दताऽन्यथा” सू॰ सि॰ तथैवोक्तेः। विवृतञ्चेदं रङ्गनाथेन

“तेन उत्तरदक्षिणगोलयोः सूर्य-स्योत्तरदक्षिणसञ्चाररूपकारणेनेत्यथैः। देवभागे जम्बूद्वीपेअत्यासन्नतया सूर्यस्यात्यन्तनिकटस्थत्वेन ग्रीष्मे ग्रीष्मर्त्तौसूर्य्यस्य तेजोगोलकस्थकिरणास्तीक्ष्णा अत्युष्णाः। असुराणां देवभाग इत्यस्य समन्वयाद्दैत्यानां भागे समुद्राद्द-क्षिणप्रदेशे हेमन्ते हेमन्तर्त्तो तुकारात् सूर्य्यस्यात्युष्णाःकिरणाः सूर्य्यस्यात्यासन्नत्वात्। अन्यथा सूर्य्यस्य दूर-स्थत्वे मन्दता किरणानामुष्णताभावः। देवभागे हेमन्तर्त्तौकराणां मन्दता। अतएव तत्र शीताधिक्यम्, दैत्यभागेग्रीष्मे कराणां मन्दता शीताधिक्य च। तथाच देव-भागे दक्षिणगोले सूर्य्यस्य दूरस्थत्वमुत्तरगोले निकट-स्थत्वं मध्यगतदेशानां क्रमेणाघिकाल्पत्वादीति भावः”। अतएवोक्तं मेषकर्कटयोर्मध्ये गाढं तपति भास्करः” ति॰ त॰ पु॰। एतच्च देवभाग एव नासुरभागे, ग्रीष्म[Page1380-b+ 38] ऋतुश्च ज्यैष्ठाषाडात्मकः।

“मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतुःशुक्रश्च शुचिश्च ग्रीष्मर्त्तुः” काल॰ मा॰ इष्टकोपधानमन्त्रोक्तेः। ततो भावे इमनिच्। उष्णिमन् पु॰ तल् उष्णता स्त्रीत्व उष्णत्व न॰ ष्यञ् औष्ण्य न॰। उष्णस्पर्शे स्वार्थे कन्उष्णस्पर्शाद्यर्थे। उष्णस्पर्शस्तु तेजसोगुणः

“स्पर्श उष्ण-स्तेजसस्तु” भाषोक्तेः जलादीनां तेजःसंयोगविशेषादौ-पाधिकः। देहस्य तथात्वे कारणमूष्मन्शब्दे वक्ष्यते गुणव-चनत्वात् प्रकारे द्वित्वम् उष्णोष्ण उष्णप्रकारे।

“उष्णो-ष्णशीकरसृजः” माघः

उष्णे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वितात्मनस्त्राणं गोरकृत्वा तु शक्तितः ॥

तप्यमानामिवोष्णेन मृणालीमचिरोद्धृताम् feverish sigh

‘उष्णोदकं समुल्लेखोद्वाहनोद्वर्तनेषु च’ –उष्ण

(“आतपः कटुको रुक्षः स्वेदमच्छातृषावहः । दाहवैवर्ण्यजननो नेत्ररोगप्रक्रोपनः” ॥ “आतपः पित्ततृष्णाग्निस्वेदमूर्च्छाभ्रमास्रकृत् । दाहवैवर्ण्यकारी च” इति सुश्रुतः ॥ यथा शाकुन्तले, — “कथमातपे गमिष्यसि परिवाधाकोमलैरङ्गैः” ॥ यथा ऋतुसंहारे, ११ । — “मृगाः प्रचण्डातपतापिता भृशम्” ॥)

स्युः प्रभारुग्रुचिस्त्विड्भाभाश्छविद्युतिदीप्तयः। रोचिः शोचिरुभे क्लीबे प्रकाशो द्योत आतपः॥

निविडकिरणेरौद्रे च।

“आतपः कटुकोरूक्षः स्वेदमूर्च्छातृषा-[Page0649-a+ 38] प्रदः। दाहवैवर्ण्यजननोनेत्ररोगप्रकोपनः” सुश्रुतः।

“भवति वपुरवाप्तच्छायमेवातपेऽपि” माघः।

“आतपात्ययसं-क्षिप्तनीवाराषु निषादिभिः” रघुः।

“तमातपक्लान्तमनात-पत्रम्” रघुः।

“शृङ्गाणि यस्यातपवन्ति सिद्धाः” कुमा॰।

“शीतातपाभिघाताश्च विविधानि भयानि च” मनुः। आतपश्च विरलसंयोगापन्नः सूर्य्यस्य किरणभेदःस एव रौद्रशब्दाभिधेयः प्रकाशस्तु ततोऽपि विरलसंयोगा-पन्न इति प्रकाशरौद्रयोर्भेदः। अस्य च निविडतेज-स्कत्वादुष्णस्पर्शवत्त्वम् तेन दुःखदायकत्वं मनुनोक्तम्। एवं

“आतापतापितभूमौ माधव! माधव! मा धावेति” यशोदावाक्येऽपि।

छायातपौ ब्रह्मविदो-वदन्ति” श्रुतिः

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घर-2

कल आपको घर शब्द के अर्थ बताये थे आज आपको घर का मुहावरों / वाक्यों में प्रयोग और उनका अर्थ बताते हैं
a. अपना घर समझना =आराम की जगह समझना, संकोच न करना
b. घर आबाद होना = ‘घर बसना’ शादी होना
c. घर बनना । घर उजड़ना
d. घर करना = बसना । रहना । निवास करना
e. घर का प्रबंध करना । घर सँभालना । किफायत से चलना ।
f. घर करना = पत्नी भाव से किसी के घर में रहना ।
g. आँख में घर करना = इतना पसंद आना कि उसका ध्यान सदा बना रहे ।
h. चित्त, मन या हृदय में घर करना = पसंद आना
i. दीआ घर करना = दीपक बुझाना
j. घर का मामला, घर की बात,
k. घर का वास्ता
l. घर के आदमी
m. घर का आँगन हो जाना
n. घर का उजाला
o. घर का चिराग
p. घर का बोझ उठाना
q. घर का भेदिया
r. घर का भोला
s. घर का काट खाना या काटने दौड़ना = घर में रहना अच्छा न लगना
t. घर में उदासी छाना
u. घर का न घाट का
v. घर का हिसाब = अपने इच्छानुसार किया हुआ हिसाब । मनमाना लेखा
w. घर का रास्ता =सीधा या सहज काम
x. घर का मर्द = शेखी बघारनेवाला “मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े । द्विज देवता घरहिं के बाढ़े । तुलसी” ग्वालिनि हैं घर ही की बाढ़ी । निसि अरु दिन प्रति देखति हौं, आपनैं ही आँगन ढाढ़ी ।—सूर
y. घर का नाम उछालना या डुबोना = कुल को कलंकित करना ।
z. घर की पूँजी
aa. घर की तरह बैठना
bb. घर की खेती = अपनी ही वस्तु
cc. घर की मुर्घी साग बराबर = घर की अच्छी वस्तु की भी इज्जत नहीं होती है
dd. घर के घर = भीतर ही भीतर । गुप्त रीति से
ee. बहुत से घर
ff. घर के घर रहना = किसी व्यवसाय में न हानि उठाना न लाभ
gg. घर खोना =वर सत्यानाश करना
hh. घर उजाड़ना- चूकते ही चुकते तो सब गया । चूककर खोना न अब घर चाहिए ।
ii. घर गई = निगोड़ी
jj. घर घर के हो जाना = तितर बितर हो जाना – तेरे मारे यातुधान भए घर घर के ।—तुलसी
kk. घर घर = हर एक घर में
ll. घर घाट – चाल ढाल रंग ढंग
mm. घर घालना= परिवार बिगाड़ना
nn. घर डुबोना
oo. घर डूबना
pp. घर जाना = कुल का नाश होना
qq. घर झँकनी = एक घर से दूसरे घर घूमनेवाली ।
rr. घर तक पहुँचना = माँ बहन की गाली देना । बाप दादों तक चढ़ जाना ।
ss. घर घाम में छवाना = धमकी देना
tt. घर पड़ना= घर में आना – आलसी घर गगा आई मिटि गई गर्मी भई सियराई ।—कबीर
uu. घर फटना – दीवार टूटना, या घर में बच्चा होना
vv. घरफूँक तमाशा
ww. घर फोड़ना = घर में विग्रह उत्पन्न करना
xx. घर बंद होना = घर में प्राणी न रह जाना
yy. घर में फूट
zz. घर बैठना – बेरोजगार
aaa. घर बैठे रोटी = बिना मेहनत की रोटी
bbb. घर बैठे = बिना कुछ काम किए
ccc. घर बैठे बैर दौड़ाना = मंत्र के बल से अपने पास किसी वस्तु या व्यक्ति को बुला लेना ।
ddd. घर भरना
eee. घर भाँय भाँय करना = घर का सूनापन खलना
fff. घर सिर पर उठा लेना = बहुत अधिक शोर करना ।
ggg. घर से पाँव निकालना = इधर उधर बहुत घूमना ।
hhh. घर से बाहर पाँव निकालना= कमाई से अधिक खर्च करना ।

घर

 

घर, बहुत ही आसन सा लगने वाला शब्द है, रोजमर्रा की जिन्दगी में इस्तेमाल होता है और रोज शाम को हम सब घर वापस आते हैं, तो इस शब्द का अर्थ क्या है? क्या वही जो हम समझते हैं या फिर कुछ और भी मतलब होते हैं आइये देखते हैं । इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द गृह से हुई है हम्यते गम्यतेऽतिथिभिः हन– “हन्तेरन् घश्च” उणा॰ नलोपश्च। गृहे दशपादीवृत्तिः। गृह, त् क ङ ग्रहे । इति कविकल्पद्रुमः ॥

  • निवास का स्थान, मनुष्यों के रहने का स्थान । इष्टकादिरचितवासस्थानम् । घर इति भाषा ॥

घर घर माँगे टूक पुनि भूपति पूजे पाय । जे तुलसी तब राम बिनु ते अब राम सहाय ॥

  • अपने परिवार या कुटुंब का प्राणी, भाई बंधू – तीन बुलाए तेरह आए, नए गाँव की रीत । बाहरवाले खा गए घर के गावें गीत ।
  • पति । स्वामी । भर्त्तार- घर के हमारे परदेश को सिधारे यातें दया करि बूझी हम रीति राहवारे की ।—कविंद
  • जन्मस्थान । जन्मभूमी । स्वदेश
  • घराना । कुल । वंश । खानदान । जो घर बर कूल होय अनूपा । करिय विवाह सुता अनुरूपा ।—तुलसी

प्रभु मेरे औगुन चित न धरौ। समदरसी प्रभु नाम तिहारो अपने पनहिं करौ॥

इक लोहा पूजा में राखत इक घर बधिक परौ। यह दुबिधा पारस नहिं जानत कंचन करत खरौ॥ सूर

  • कार्यालय । कारखाना । आफिस । दफ्तर । जैसे,—डाकघर, तारघर, पुतलीघर, रेलघर, बंकघर
  • कोठरी । कमरा ।
  • आड़ी खड़ी खिंची हुई रेखाओं से घिरा स्थान जैसे,—कुंडली या यंत्र का घर ।
  • शतरंज आदि का चौकोर खाना ।
  • कोई वस्तु रखने का डिब्बा या चोंगा । चश्माघर
  • ग्रहों की राशि । दं पिण्डं नवधा स्थापितम् यथाक्रमम् नवाद्यड्कैर्गुणिते नागाद्यङ्कैर्हृते आयादयःस्युः। यथा
  • अँटने या समाने का स्थान । छोटा गड्ढा । जैसे, —पानी ने स्थान स्थान पर घर लिया है ।
  • किसी वस्तु (नगीना आदि) को जमाने या बैठाने का स्थान । धोखैं ही धोखैं डहकायौ।

समुझी न परी विषय रस गीध्यौ हरि हीरा घर मांझ गंवायौं॥ सूर

  • छेद । बिल । सूराख । जैसे, —छलनी के घर । बटन के घर ।
  • राग का स्थान ।
  • उत्पत्ति स्थान । रोग का घर
  • भांडार । खजाना, बिंधि न ईंधन पाइऐ सागर जुरै न नीर । परै उपास कुबेर घर जो बिपच्छ रघुबीरो ॥ तुलसीदास
  • दाँव । पेंच । युक्ति ।
  • समानार्थक:गृह, गेह, उदवसित, वेश्मन्, सद्मन्, निकेतन, निशान्त, वस्त्य, सदन, भवन, आगार, मन्दिर, निकाय्य, निलय, आलय, शरण, धामन्, क्षय, धिष्ण्य, पुर, कुल, ओकस्

घर शब्द का साहित्य में प्रयोग

एक गिलहरी एक पेड़ पर

बना रही है अपना घर,

देख-भाल कर उसने पाया

खाली है उसका कोटर । हरिवंश राय बच्चन

वो क़दरें अब नज़र आतीं नहीं घर में,. जो रिश्ते वो सुनाती थीं. वह सारे उधड़े-उधड़े हैं,. कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है – गुलज़ार

घर पठई प्यारी अंकम भरि। कर अपनैं मुख परसि तिया कौ, प्रेम सहित दोऊ भुज धरि धरि।। सूर

चली ब्रज घर घरनि यह बात। नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥

कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ। कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥ – सूर

सांझ भई घर आवहु प्यारे। दौरत तहां चोट लगि जैहै खेलियौ होत सकारे॥ – सूर

चकित भई ग्वालिनि मन अपनै, ढूंढ़ति घर फिरि-फेरि। देखति पुनि-पुनि घर के बासन, मन हरि लियौ गोपाल। – सूर

ग्वालिनि जौ घर देखै आइ । माखन खाइ चोराइ स्याम सब, आपुन रहे छपाइ ॥ सूर

पैठे सखन सहित घर सूने माखन दधि सब खा। छूंछी छांड़ि मटुकिया दधि की हंस सब बाहिर आ॥

आ ग कर लियें मटुकिया घर तें निकरे ग्वाल। माखन कर दधि मुख लपटायें देखि रही नंदलाल॥ सूर

ब्रज जुवती इक पाछें ठाड़ी सुनति स्याम की बातें। मन-मन कहति कबहुं अपने घर देखौ माखन खातें॥ सूर

राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास । तरु सुरतरु सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास ॥ तुलसी

सीस उधारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग । घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग ॥ तुलसी

घर कीन्हें घर जात है घर छाँड़े घर जाइ । तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ ॥ तुलसी

सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहहिं प्रिय बैन । ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन ॥ तुलसी

राम लखन बिजई भए बनहुँ गरीब निवाज । मुखर बालि रावन गए घरहीं सहित समाज ॥ तुलसी

खग मृग मीत पुनीत किय बनहुँ राम नयपाल । कुमति बालि दसकंठ घर सुहद बंधु कियो काल ॥ तुलसी

रैअत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु । सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु ॥ तुलसी

फोरहिं सिल लोढ़ा सदन लागें अढुक पहार । कायर कूर कुपूत कलि घष घर सहस डहार ॥ तुलसी

मनिमय दोहा दीप जहँ उर घर प्रगट प्रकास । तहँ न मोह तम भय तमी कलि कज्जली बिलास ॥ तुलसी

तू दिगम्बर विश्व है घर

ज्ञान तेरा सहज वर कर।

शोकसारण करणकारण,

तरणतारण विष्णु-शंकर। सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

कहीं साँस लेते हो,

घर-घर भर देते हो,

उड़ने को नभ में तुम

पर-पर कर देते हो,

आँख हटाता हूँ तो

हट नहीं रही है। सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

उठता हाहाकार जिधर है. उसी तरफ अपना भी घर है. खुश हूं — आती है रह-रहकर. जीने की सुगन्ध बह-बहकर – केदारनाथ सिंह

तेरे घर के द्वार बहुत हैं, किसमें हो कर आऊं मैं?

सब द्वारों पर भीड़ मची है, कैसे भीतर आऊं मैं?

द्वारपाल भय दिखलाते हैं, कुछ ही जन जाने पाते हैं,

शेष सभी धक्के खाते हैं, क्यों कर घुसने पाऊं मैं? मैथिलीशरण गुप्त

“यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।”

चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी स्वर को।

बैठी थी अचल तदापि असंख्यतरंगा,

वह सिन्हनी अब थी हहा गोमुखी गंगा।

 

“हाँ, जानकर भी मैंने न भरत को जाना,

सब सुनलें तुमने स्वयम अभी यह माना।

यह सच है तो घर लौट चलो तुम भैय्या,

अपराधिन मैं हूँ तात्, तुम्हारी मैय्या।” मैथिलीशरण गुप्त – साकेत

घर चलो इसी के लिए, न रूठो अब यों,

कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों?

मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,

मेरे दुगने प्रिये, रहो न मुझसे न्यारे। मैथिलीशरण गुप्त – साकेत

पड़े उपद्रव की भी उसके

कब-किसके घर वारी,

उलही पड़ती आप, उलहना

लाती है जो नारी। मैथिलीशरण गुप्त

मैं कहती हूँ—बरजो इसको,

नित्य उलहना आता,

घर की खाँड़ छोड़ यह बाहर

चोरी का गुड़ खाता। मैथिलीशरण गुप्त

जैसे धनी-मानी गृही जाय तीर्थ-कृत्य को,

और घर-वार सौंप जाय भले भृत्य को,

सौंपा अपने को यह राज्य वैसे जानो तुम,

थाती इसे मानो, निज धर्म पहचानो तुम।

त्यागो शची-संग रहने की पाप-वासना,

हर ले नरत्व भी न कामदेवोपासना।’’ मैथिलीशरण गुप्त

‘‘आपकी कृपा से देव-कार्य विघ्न-हीन है,

जाकर रसातल में दैत्य-दल दीन है।

बाहर की जितनी व्यवस्था, सब ठीक है,

घर की अवस्था किन्तु शून्य, अलोक है। मैथिलीशरण गुप्त

घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा

घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा। मैथिलीशरण गुप्त

द्वार बन्द करके भी तू है

चैन नहीं पाता डर से,

तेरे भीतर चोर घुसा है,

उसको तो निकाल घर से।

चुरा रहा है वह कृति-कान्ति,

शान्ति नहीं, यह तो है श्रान्ति ! मैथिलीशरण गुप्त

“दुराधर्ष”

  1. दुराधर्ष (दुर् + आ + धृष अच्) दुष्टान् राक्षसान् आधर्षति। दुष्टान् यज्ञविघ्नकारिराक्षसादीन् आधर्षति दूरीकरोतीति ।

दुष्ट और राक्षस प्रकृति के व्यक्ति, वो जो यज्ञ में विघ्न पैदा करे।

२.   “भीमसेनो गदां भीमां प्रवार्षन् परिघोपमाम् । प्रचकर्ष महासैन्यं दुराधर्षो महामनाः।।“

“स प्रभावात् दुराधर्षो महाबलपराक्रमः”

वो व्यक्ति जिसका दमन करना कठिन हो या जिसे कठिनाई से जीता जा सकता हो, जो वश में न आ सके, प्रबल व्यक्ति ।

धूमकेतु शटकोटि सम दुराधर्ष भगवंत ।—तुलसी

दवन दुवन दल दर्प दिल दुराधर्ष दिगदंति । दशरथ के सामंत अस दशदिग कीर्ति करंति ।—रघुराज

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत। धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत।।

३.         “अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ।” दुःखेन आ ईषदपि धर्षयितुमशक्यः इति । धृष् + “ईषद्दुःसु- ष्विति ।विष्णुः । अनुत्तमो दुराधर्ष: कृतज्ञ: कृतिरात्मवान्‌। विष्णु सहस्त्रनाम

“जगन्नाथो दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति”

भगवान् विष्णु को भी दुराधर्ष कहा गया है

४.         श्वेतसर्षपे तत्क्षेपणे हि वेतालादीनामपसर्पणं स्मृतौदर्शितम्। दुःखेन ईषदपि धर्षयितुमशक्यम् दुर् +आ + धृष–कर्मणि खल्।

सफ़ेद सरसों को भी दुराधर्ष कहा गया है

५.         रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।।

“दैत्यादिभिर्धर्षयितुं न शक्यते इति दुराधर्षः ।” इति तद्भाष्ये शङ्करः ॥

भगवान् शिव को भी दुराधर्ष कहा गया है, जिनको देख कर कामदेव भी भयभीत हो गया था

६.         “कुटुम्बिनीवृक्षे स्त्री राजनि”॰ “कुटुम्बिनीवृक्षः। अवलम्बः राजनिघण्टुः॥“

कुटुम्बिनी- एक क्षुद्र गुल्म जो मीठा, संग्राहक, कफपित्त का नाशक, रक्तशोधक और व्रण में उपकारी होता है । वृक्षे- वृक्ष स्त्री- स्त्री या प्रियंगु लता राजनि – रानी

अब यह क्या है मुझे भी नहीं मालूम पर शब्दों से कोई पेड़ या लता मालूम होती है इसके बारे में मुझे और जानकारी नहीं मिली

७.         ‘स विजित्य दुराधर्ष भीष्मकं माद्रिनंदनः कोसलाधिपं चैव तथा वेणातटाघिप।’ ‘वेणा भीमरथी चैव नद्यौ पापभयापहे, मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालयभूपिते।

वेणा या ‘वेण्या” नदी ‘तुंगभद्राकृष्णावेण्याभीमरथीगोदावरी।”

कुछ और सन्दर्भ

तात कश्यपदायाद विनतागर्भसंभव ।।

तेजोराशे दुराधर्ष संतापं मा कृथा वृथा।। ३२ ।। स्कन्दपुराणम्/खण्डः ५ (अवन्तीखण्डः)/अवन्तीस्थचतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्यम्/अध्यायः ७६

तसिंस्तु निहत पूरे दुराधर्ष महात्मनि। किजुखित्कुरवाऽकार्बुर्निमग्राः शेाकसागरे । महाभारत द्रौण पर्व

पावीरवी कन्या चित्रायु: सरस्वती वीरपत्नी धियं धात्। ग्नाभिरचिछद्र शरणं सजोषा दुराधर्ष गृणते शर्म यंसत्॥७॥ ऋग्वेद

भानेोरैव तथारखे वसत्यवसरेण हि। श्रखाधीने दुराधर्ष किद्रज्ञेा दानवाधनः । महाभारत

चिथमाणे दुराधर्ष भीमा राजानमब्रवीत्। महाभारत

भानेोरैव तथारखे वसत्यवसरेण हि। श्रखाधीने दुराधर्ष किद्रज्ञे दानवाधमः ।महाभारत

पुष्यायुध दुराधर्ष प्रचण्डशरकार्बुर्क। लद्दर्शनसमुबूर्त विथन्त दुखहै शरै । महाभारत आदिपर्व

गृहीतास्त्रोऽस्मि भगवन् दुराधर्षस्सुरैरपि।

अस्त्राणां त्वहमिच्छामि संहारं मुनिपुङ्गव।।1.28.2।। बाल्मीकि रामायण

अमात्या बुद्धिसम्पन्ना राष्ट्रं बहुजनप्रियम् ।। दुराधर्ष पुरश्रेष्ठं कोशः कृच्छसहः स्मृतः ।।

अप्रमत्तं कथं तं तु विजिगीषु बले स्थितम् । जितरोषं दुराधर्ष प्रधर्षयितुमिच्छथ ।।

“दुपहरिया”

 

दुपहरिया शब्द बना है दोपहर [दो + पहर] से जिसका मतलब होता है मध्याह्न का समय, यानि सबेरे और संध्या के बीच का समय । वह समय जब सूर्य मध्य आकाश में रहता है । मतलब मध्याह्नकाल।

दुपहरिया के पर्याय हैं दिवामध्य, पृष्ठताप, उद्दिन, दिनार्द्ध, और अर्द्धभास्कर, कड़ी दोपहर को अतिमध्यंदिन, या अतिमध्यन्दिन कहते हैं ।

समशंकु या समशङ्कु उस समय को कहते हैं जब सूर्य ठीक सिर पर हो ।

केदारनाथ सिंह जी के शब्दों में

थक कर ठहर गई दुपहरिया, रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में- और चमकने लगी रुखाई,

और

हजारों घर, हजारों चेहरों-भरा सुनसान –

बोलता है, बोलती है जिस तरह चट्टान

सलाखों से छन रही है दोपहर की धूप

धूप में रखा हुआ है एक काला सूप

 

धर्मवीर भारती के शब्दों में

अपने हलके-फुलके उड़ते स्पर्शों से मुझको छू जाती है

जार्जेट के पीले पल्ले–सी यह दोपहर नवम्बर की।

आयीं गयीं ऋतुएँ पर वर्षों से ऐसी दोपहर नहीं आयी

जो कंवारेपन के कच्चे छल्ले–सी

इस मन की उंगली पर

कस जाये और फिर कसी ही रहे

नित प्रति बसी ही रहे

आँखों, बातों में, गीतों में,

आलिंगन में, घायल फूलों की माला–सी

वक्षों के बीच कसमसी ही रहे।

 

झुरमुट में दुपहरिया कुम्हलायी

खेतों पर अन्हियारी छाई

पश्चिम की सुनहरिया घुंघराई

टीलों पर,तालों पर

इक्के-दुक्के अपने घर जाने वालों पर

धीरे-धीरे उतरी शाम।

धर्मवीर भारती

 

पाबलो नेरुदा की एक कविता का हिंदी अनुवाद

तुम्हारी समन्दर-सी गहरी आँखोँ मेँ,

फेँकता पतवार मैँ, उनीँदी दोपहरी मेँ

उन जलते क्षणोँ मेँ, मेरा एकाकीपन,

और घना होकर, जल उठता है – डूबते माँझी की तरह

लाल दहकती निशानीयाँ, तुम्हारी खोई आँखोँ मेँ,

जैसे “दीप ~ स्तँभ” के समीप, मँडराता जल !

राम त हये मोरी अतल के पुतरिया, ललन सोरा नयनवत हो राम! सीता त रहीं मोरी हाथ परि” केसे बना जिया में बोनों हो राम! राम त गये सोरा भरी दुपहरिया लधिमन गये सखा बेरिया हो राम! गोरी सीता के गये भई निति अन्दियरिया, कैसे बना जिया समझती हो राम!

-अवधि वाचिक कविता

२. गुल-दुपहरिया नाम का पौधा और उसका फूल।

पग पग मग अगमन परति चरन अरुन दुति झूलि । ठौर ठौर लखियत उठे दुपहरिया से फूलि ।—बिहारी

दुपहरिया के फूल बलि निसि फूले तुव चाहि |

पर्या॰—बंधूक । बंधुजीव । रक्त । माध्याह्निक । बंधुर । सूर्य- भक्त । ओष्ठपुष्प । अर्कवल्लभ । हरिप्रिय । शरत्पुष्प । ज्वरध्न । सुपुष्प ।

३. जिसका गर्भाधान दोपहर को हुआ हो,  बहुत दुष्ट या पाजी।