आशंका

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रात गहराती जा रही थी

वो अभी तक घर नहीं पहुंची थी

घरवालो के चेहरों पर चिंताओं की रेखाए गहराने लगी थी

दिल में तरह तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थी

कहाँ रह गयी

रोज़ तो ६ बजे  तक आ जाती थी

यदि देर से आना होता था तो पहले बता जाती थी

आज तक कभी भी बिना बताये देर से नहीं आई थी

फिर आज क्या हो गया

क्यों नहीं आई है अभी तक

कितनी देर हो गयी है

नेहा अपने माँ बाप की इकलौती बेटी है,

पढाई पूरी करने के बाद उसने गुरुग्राम में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करना शुरू किया

पिछले पांच सालों से वो वहीँ कम कर रही थी

बहुत ही नियत जिन्दगी थी

सुबह पांच बजे उठाना और घर के कामो में लग जाना

माँ पिताजी को नाश्ता करा अपना टिफन बना काम पर ८ बजे निकल जाना

शाम को ६ बजे घर वापस आ शाम का खाना बनाना और रात्रि ९ बजते बजते थक कर चूर सो जाना

अगले दिन फिर वोही दिनचर्या

समय की इतनी पाबंध  की आप अपनी घडी मिला ले

बत्तीस साल की उम्र में कोई दोस्त नहीं

और यदि हों तो पता नहीं

वैसे दिनचर्या देख लगता नहीं था की उसका कोई दोस्त होगा

बहुत रूखी थी वो

या फिर हालत ने ऐसा बना दिया था

पूरी जिन्दगी माँ पिता के चारों और ही घूमती थी

पिताजी एक सरकारी विभाग में क्लर्क थे

एक इमानदार कर्मचारी

जिन्दगी में कभी किसी से कुछ नहीं लिया

जो कमाया बिटिया की पढाई में लगा दिया

माँ एक घरेलु महिला थी

पूरा समय धर्म कर्म में ही बिता देती थी

पड़ोसियों ने तो शायद कभी उनकी शक्ल ही नहीं देखि थी

बालकनी में कपडे सुखाने और तुलसी में पानी डालने जाना ही उनका घर से बाहर कदम रखने के बराबर था

दोनों की पूरी जिन्दगी बिटिया के इर्द गिर्द ही घूमती थी

नेहा भी बचपन से पढने में बहुत तेज थी

अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आती थी

सारे  अध्यापको की प्यारी थी वो

स्कूल में उसके दोस्त थे पर कोई भी शायद ऐसा नहीं जो उसे अच्छे से जनता हो

वो सबके साथ मीठा बोलती थी

परन्तु किसी से कभी कोई फालतू बात नहीं

स्कूल का कोई दोस्त भी शायद कभी घर आया हो

कॉलेज की पढाई उसने दिल्ली से की

वहां भी सुबह मेट्रो से जाना और शाम को वापस घर

कालेज में भी अकेली थी वो

जैसे उसे किसी की जरूरत ही नहीं थी

उसकी जिन्दगी अकेले ही चलती थी और वो भी बहुत अच्छे

फिर पिछले पांच सालों से वो ये नौकरी कर रही थी

घडी की सुइयों की तरह

दिनचर्या की पक्की

समय की पाबंध

पर आज

आज अभी तक घर क्यों नहीं आई

कितनी देर हो गयी है

बूढ़े माँ बाप अकेले घर में परेशान  हैं

जमाना बहुत ख़राब है

रोज ही किसी न किसी के साथ …

अभी कुछ दिन पहले ही तो महिला से जबरदस्ती कर उसके दुधमुहे बच्चे को मार डाला था

उससे कुछ दिन पहले मानेसर में हुआ था

और निर्भया, बेचारी उसका क्या कसूर था घर ही तो आ रही थी

देश में लगभग रोज ही कहीं न कहीं किसी न किसी के साथ बलात्कार होता है

और अब तो गैंग रेप भी बढे है

हाईवे पर परिवार के साथ भी लोग सुरक्षित  नहीं

कुछ भी कहीं भी हो सकता है

कहीं नेहा के साथ तो कुछ नहीं …..

शुभ शुभ बोलो ……

जवान बेटी अगर घर नहीं आती तो माँ बाप के दिमाग में तरह तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगती है

उनका भी क्या कसूर

जमाना कितना ख़राब हो गया है आज कल

देखो न कितनी रात हो गई

अभी तक घर नहीं आई

सावित्री ने अपने पति से कहा

सुनो जी

सात बज गए हैं नेहा अभी तक नहीं आई

आप फ़ोन क्यों नहीं करते

उससे पूछो तो क्या हुआ ? कहाँ है वो ?

देर क्यों हो रही है ?

सब ठीक तो है न

मेरा तो दिल उन्होनी की आशंकाओं से धड़क रहा है

दिल तो पिता का भी धक् धक् कर रहा था

पर हिम्मत जुटा रखी थी

अगर मैंने जरा सा भी तनाव दिखाया तो सावित्री और परेशान हो जाएगी

अभी सात ही तो बजा है

हो सकता है आज ऑफिस में देर हो गयी हो

या बस न मिली हो

कुछ देर और देख लो

आ जाएगी

आप को फ़ोन लगाने में क्या दिक्कत है

मोबाइल होते किस लिए हैं

लगाइए न

अरे वो अभी सिर्फ एक घंटा देर से है सिर्फ सात बजे हैं कोई पहाड़ नहीं टूट गया

धीरज रखो

आ जाएगी

पर सावित्री वो तो माँ हैं न

और माँ का दिल

ज्यादा तेज धड़कता है

और खटका तो उसे हमेशा लगा रहता है

माँ का दिल कमजोर होता है न

और ऊपर से पत्रकार

सारा दिन टीवी और अख़बारों मैं दहशत फैलाते रहते हैं

पर उनका क्या दोष है

समाज का इतना पतन हो गया है

छोटे छोटे बच्चे बलात्कारी हो गए हैं

और बिचारे उनके माँ बाप

उनका दर्द कोई समझ सकता है क्या

जवान लड़की जब घर से बाहर हो तो माँ के लिए सूरज छुपते ही रात हो जाती है

पूरी जिन्दगी अपना सुख दुःख भूल जो बच्चो को बड़ा करता है

अपना पेट काट बच्चो को अच्छी शिक्षा देता है

उन्हें कुछ बनता देख खुश होता है

और अगर औलाद अकेली हो

तो बूढ़े माँ बाप के दिल को कौन समझा सकता है

और वो भी अगर लड़की नेहा हो

कोई एब नहीं कोई रूचि नहीं

अपने ज़माने की लड़कियों से पूर्णतया भिन्न

जहाँ आज कल की लड़कियां पूरी रात माँ बाप की आँखों में धूल झोंक मदिरालयों और डिस्को में लडको के साथ नाचती रहती हैं वहीँ नेहा इन सब से कोसो दूर

आजकल की लड़कियां

बाप रे बाप

इनकी राते काली नहीं रंगीन होती है

शराब से तो बिलकुल परहेज नहीं लडको से ज्यादा, शायद प्रतिद्वन्दता में

या फिर लडको से प्रतिस्पर्धा

हम किसी से कम नहीं शायद

कोई लिंग भेद नहीं

कपडे भी देखो

कैसे कैसे पहनती हैं बिलकुल न के बराबर या फिर ऊटपटांग

कोई हया कोई शर्म कुछ नहीं

पर सब ऐसी नहीं हैं

अपनी नेहा को ही ले लो

पवित्रता की प्रतिमा है

सावित्री फिर अपने पति से बोली

सुनते हो

एक फ़ोन तो लगाओ

अब तो आठ बजने को है

दिल तो पतिदेव का भी जोरो से धड़क रहा था

पर कमजोर जो नहीं दिखना चाहते थे

पर पत्नी के आगे कितनी देर चलती उनकी

उन्होंने फ़ोन उठाया और नेहा का नंबर लगाया

दूसरी तरफ से एक चिरपरिचित आवाज आई

“आप के द्वारा डायल किया गया नंबर अभी पहुँच से बाहर है कृपया पुन: प्रयास करे”

अब तो दौनो को मनो जैसे काटो खून नहीं

सावित्री के दिमाग में तो तरह तरह की आशंकाएं कौंध गयी

पतिदेव भी कुछ परेशान से दिखने लगे

बोले

ऑफिस फ़ोन लगाता हूँ

और उन्होंने ऑफिस का नंबर डायल किया

बहुत देर तक घंटी जाने के बाद किसी ने उसे नहीं उठाया

अब तो दोनों परेशान

समझ नहीं आ रहा था की क्या हुआ

क्या करें

कहाँ होगी नेहा ?

सावित्री बोली

आप ईशा को फोने लगाओ

वो तो नेहा के साथ ही काम करती है और मैहरोली तक उसके साथ ही आती है

उससे पूछो की वो कहाँ है और नेहा उसके साथ तो नहीं है

पिता जी ने अब कांपते हाथो से ईशा को फोन लगाया

घंटी तुरंत चली गयी

पिता जी की दिल की धड़कन बढ गई

चौथी घंटी जाने के बाद ईशा ने फोन उठाया

hellहेल्लो

हाँ बेटी ईशा

जी अंकल

बेटी नेहा अभी तक घर नहीं आई है

तुम्हारे साथ है क्या ?

नहीं अंकल वो तो मेरे ही साथ साढ़े पांच बजे ऑफिस से निकली थी और मैहरौली तक मेरे साथ आई थी

मैं सवा छह बजे घर पहुंची हूँ

आप ने नेहा को फोन किया क्या ?

हाँ पर वो कवरेज छेत्र से बाहर आ रहा है

आप फिर कोशिश करो अंकल कोई नेटवर्क प्रॉब्लम होगी

मैं भी कोशिश करती हूँ

अगर बात होती है तो आप को बताती हूँ

अब तो दोनों को काटो तो खून नहीं

सांप सूंघ गया हो जैसे

दिमाग ने काम करना बंद कर दिया

मैहरोली तक साथ थी

वहां से साकेत तक तो कुल 15 मिनट लगते हैं

अब दो घंटे होने को हैं

कहाँ है नेहा ?

दुबारा फोन लगता हूँ

कह कर पिता जी ने नेहा का नंबर मिलाया

दूसरी तरफ से फिर चिरपरिचित आवाज आई

“जिस नंबर से आप संपर्क करना चाहते हैं वो अभी बंद है कृपया पुन: प्रयास करें”

सावित्री का तो दिल धडकना लगभग बंद हो गया

मैहरोली तक तो ईशा के साथ आई है

फिर कहाँ चली गयी

फ़ोन क्यों बंद है

कहाँ रह गयी है

क्या पुलिस को फोन करें

अस्पतालों में फोन कर पूछे

कहीं कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयी

टीवी चालू कर न्यूज़ देखो

कहीं कुछ हुआ तो नहीं

कहीं आतंकवादियों ने तो कुछ नहीं कर दिया

मेट्रो में घुसना तो आसान है कोई सुरक्षा नहीं है कोई भी टिकेट ले घुस सकता है

रोज कहीं न कहीं आतंकी हमले हो रहे है

और हमारी कानून व्यवस्था तो बिलकुल लचर है

अभी इंग्लैंड में हुआ था उससे पहले पेरिस में

यहाँ भी रोज कहीं न कहीं कुछ न कुछ होता रहता है

कोई आन्दोलन भी हो सकता है

रोज होते हैं कभी इनके कभी उनके

और सबसे पहले यातायात से साधनों को ही नुक्सान पहुचाते हैं

रेल और सड़क रोक लेते हैं

कहीं ऐसा ही तो कुछ नहीं हुआ

पता नहीं कहाँ फसी होगी नेहा

किस हाल में होगी

भगवान् भली करें

भली ही करेंगे

बिचारी नेहा ने किसी का क्या बिगाड़ा है

सावित्री अब पूरी तरह से घबरा गयी थी

टीवी के चैनल बदल बदल के देखना शुरू कर दी थी

पिता जी फ़ोन ले के बार बार नेहा का नंबर लगा रहे थे

फोन अभी भी नेटवर्क से बाहर  था

आशंकाएं अब खौफनाक हो चली थी

संत्रास बढ़ता जा रहा था

तभी दरवाजे की घंटी बजी

सावित्री ने दौड़ के दरवाजा खोला

दरवाजे पर नेहा थी उसके चेहरे पर उदासी थी जैसे बस अभी रो देगी

पर सावित्री की ख़ुशी का ठिकाना न था

उसने झपट कर नेहा को गले लगा लिया

और दोनों रोने लगी

शब्दाभाव

इति

 

 

भूत हूँ मैं

कहीं दूर घने बियाबान में पायलों की झंकार सुनाई देती हैं ……

दिल तेजी से धड़कने लगता है …..

लो वो आ गयी…… आज फिर

घने जंगले में पेड़ो के झुरमुटों के बीच खंडहर में ….

मोमबत्ती की कापती लों के पीछे वो सफ़ेद साड़ी में दिखती है ….

चेहरा बेतरतीब बालो से ढका है ….

कौन है ये अभागी …. क्यों भटक रही है बियाबान जंगलों में ….

फिर वो बड़ी अदा से अपने बालों को पीछे धकेलती है … और गाना गाना शुरू कर देती है …..

मेरी नज़र अब चेहरे पर ज़ूम होती है…..

और………..

होठों पर लगी लाल लिपस्टिक देखते ही हंसी छूट जाती है

जैसे ही मेरी हंसी निकली, उसका ध्यान मुझ पर गया, वो मेरी तरफ मुड़ी …. घूर के मुझे देखा…

उसकी आंखे… काली रात के अँधेरे की तरह स्याह थी …. उन आँखों में एक अजीब सी उदासी छाई हुई थी ….

मुझे देखते ही उन आँखों में अजीब सी चमक पैदा हुई ….

वो मुड़ी….

और मेरी तरफ बढ़ी…..

ऐसा लगा जैसे वो हवा में तैरती हुई मेरी तरफ बढ रही थी….

दिल की धड़कने और तेज होने लगी …..

लगा की दिल छाती से बाहर निकल आयेगा…

समझ नहीं आ रहा था की क्या करू

पैर जड़ से हो गए थे ….. ऐसे जैसे किसी ने शरीर से पूरा रक्त निकल लिया हो …

तभी सन्नाटे को चीरती हुई एक और गाने की आवाज आई …..

उसका ध्यान मुझ से हटा….

वो इधर उधर देखने लगी…..

मेरी जान में कुछ जान आई…

मैं भी उस आवाज की दिशा में देखने लगा …

स्याह बियाबान में कुछ नहीं दिख रहा था …

चारों तरफ सिर्फ गहन अन्धकार…

घुप्प अँधेरा…

सिवाए उस मोमबत्ती की रौशनी के दायरे के….

उस रौशनी में उसकी सुन्दरता देखते बनती थी …

चेहरे पर पाउडर, लाली, होठों पर लाल लिपस्टिक,… माथे पर अर्धचन्द्राकार चमकीली बिंदी….

मांग में…. मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया…..

मैं अचंभित उसकी ओर टकटकी लगा देखता रहा और वो…

चारो तरफ… जैसे… जैसे किसी को ढूंढ रही हो…..

गाने की आवाज लगातार तीव्र होती जा रही थी

लगता था की गाने वाला हमारी ही तरफ चला आ रहा हो

उस गाने में एक अजीब सी मिठास एक अजीब सी कशमकश ….

अजीब सा दर्द था……

वो भी उस गाने को सुन बैचैन हो उठी थी

तभी…..

बादल कुछ छंटे और चंद्रदेव की शीतल किरणों ने कुछ अन्धकार को चीरा

खण्डहर पर चांदनी पुलकित हो उठी ..

आज पूर्णिमा की रात है ,,,

मैंने मन में सोचा…

अच्छा है, यदि अमावस होती तो?

वो हैरान परेशान इधर उधर देख रही थी

गाने की आवाज अचानक बंद हो गयी …

और घोड़े की टापों ने उसकी जगह ले ली..

टप, टप टप टप….

घोडा हमारी तरफ ही बढ रहा था …

जैसे जैसे टापों की आवाज तेज होती जा रही थी…

उसकी बैचेनी भी बढती जा रही थी ….

अब उसका पूरा ध्यान .. उस घोड़े की तरफ था…

और मैं सिर्फ एक अवेक्षक की तरह …

उसकी खूबसूरती को निहारता चला जा रहा था …

कौन है ये खूबसूरत अबला?

क्या कर रही है इस बियाबान में ?

टोर्च के ज़माने में मोमबत्ती क्यों लिए है ?

तेज हवा के झोंके चल रहे है …

लौ कंप रही है….

पर मोमबत्ती है की बुझती ही नहीं?..

हमारी तो तुरंत बुझ जाती है…

क्या सुंदरी किसी का इंतज़ार कर रही है

कौन है वो जो घोड़े पर चढ़ कर आ रहा है?

क्या कोई राजकुमार?

या कोई दूल्हा? अब राजकुमार कहाँ होते हैं..

तमाम सवाल मन में चल रहे थे

जवाब…

कोई नहीं…

द्रश्यता बढ़ने पर भी सिर्फ मैं, वो और घोड़े की टाप ही सुनाई देती थी

समय की सुई जैसे अटक गयी हो

समय बीते नहीं बीतता था …

उत्सुकता बढती जा रही थी …

जानना जरूरी था की चल क्या रहा है यहाँ ?

हिम्मत बांध मैंने आगे बढ़ना शुरू किया

पर पैर जैसे पत्थर…

शने शने आगे बढ़ा

घोड़े की टाप भी तेज हो रही थी

गाने की आवाज फिर आने लगी …

अब आवाज पास आती जा रही थी….

दूर झुरमुटों से निकल एक घुड़सवार आते दिखा…

उसे देखते ही सुंदरी की काली गहरीली आंखे … लाल हो गयी…

जैसे उनमे खून उतर आया हो

घुड़सवार सुंदरी की तरफ बढ रहा था …

और वो उसकी तरफ

मेरी तरफ अब किसी का ध्यान नहीं था.

घुडसवार मुझ से अभी भी कुछ दूरी पर था

कुछ साफ़ नजर नहीं आ रहा था

सफ़ेद घोड़े पर चमकीले भड़कीले कपडे पहने वो कोई राजकुमार लग रहा था

हाँ…. उसकी कमर में तलवार भी लटकी है

पर आजकल तो चमकीले कपडे पहन तलवार लटकाए घोड़ी पर तो दुल्हे बैठते हैं…

ऐसा तो नहीं की ये किसी शादी में मंडप से भाग आया हो ?

कहीं ऐसा तो नहीं की इसकी शादी जबरदस्ती कहीं कराई जा रही हो

ये इसकी प्रेमिका तो नहीं?

फिर प्रश्न

जवाब अभी भी कोई नहीं

अब घोड़े की गति धीमी हो रही थी जैसे जैसे वो उसके पास आ रहा था

सुंदरी की काली स्याह आँखे अब और लाल होने लगी थी

अंगारों की तरह लाल ऐसा लगता था की अब अंगारे बरसेंगे

उसने अपने  मोमबत्ती वाले हाथ की कलाई की तरफ देखा …

पर उसमे घडी नहीं थी… चूड़ियाँ भी नहीं थी

कलाई नंगी थी

तो फिर …

क्यों देख रही थी वो अपनी कलाई की तरफ?

शायद आदत से मजबूर है

मैंने सोचा

आज घडी पहनना भूल गयी होगी

दोनों के बीच कुछ तो है यह तो अब स्पष्ट हो गया था

परन्तु क्या ?

अभी में सोच ही रहा था तब तक वो फिर उस घुड़सवार को देखने लगी

दोनों एक दूसरे की तरफ बढ रहे थे

खंडहर के बीचोबीच चांदनी में अब सब साफ़ दिखाई दे रहा था

घोडा उसके करीब आ चुका था

वो थम गया था

सुंदरी के पास पहुचने पर वो घोड़े से उतरा …

अब दोनों एक दूसरे की तरफ बढे…

हवा में उड़ते हुए से….

बाहुपाश में समां गए

समय जैसे थम सा गया

दोनो अब आलिंगन मुक्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे

चारो तरफ सन्नाटा बियाबान

और ये दोनों दिन दुनिया से बेखबर….अपने में मशगूल

यहाँ तक की मुझे भी जैसे भूल गयी थी वो …

पक्का ये दो प्रेमी हैं

लगता है जन्मो बाद मिले हैं

जन्मो बाद? कितने जन्मो बाद?

मैं अभी ये सब सोच ही रहा था की बदल फिर से छाने लगे

काली घनघोर घटाएँ उमड़ने लगी

वैसे ही जैसे इन दो प्रेमियों से प्रेरित हो उमड़ रही हों

हवा के झोंके तेज होने लगा

मैंने सोचा इस बरसात अब आने ही वाली है

जल्दी से कोई ठिकाना ढूँढ लेता हूँ

वरना भीग जाऊँगा, सर्दी भी लग सकती है

इन दोनों का चक्कर छोड़ो

मैं खण्डहर की तरफ बढ़ने लगा

एक टूटे कमरे में इकलोती टूटी छत के नीचे जा खड़ा हुआ

हवा यहाँ भी आ रही थी

धीमी फुआर भी पड़ने लगी थी

मौसम सुहाना होता जा रहा था

अँधेरा बढ रहा था ..

और मोमबत्ती …

वो तो उसके पास है ..

ध्यान फिर उन्ही दोनों की तरफ चला गया

क्या कर रहे हैं दोनों ?

क्या अभी तक आलिंगनबध हैं ?

उत्सुकता कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी

मैं फिर कौने में टूटी दीवार की तरफ बढ़ा

मोमबत्ती की रौशनी का दयारा अभी भी उतना ही था

लौ अभी भी कांप रही थी

बारिश की बूंदों से उनकी भी एकाग्रता भंग हुई

वो उससे कुछ बोली

कुछ साफ़ सुनाई नहीं दिया

उसने हाँ में सर हिलाया और वो दोनों अब उसी स्थान की तरफ बढ़ने लगे जहाँ में पहले से ही बारिश से बचने सर छुपाये हुए था

शने शने वो मेरी तरफ बढ रहे थे

उन दोनों को अपनी तरफ आता देख मेरी उत्सुकता बढ रही थी

सोचा पूछ लूँगा की इस भयावय रात में वो यहाँ क्या कर रहे हैं

फिर लगा कहीं उन्हें बुरा न लग जाये

या फिर बोले “माइंड योर बिज़नस”

किरकिरी हो जाएगी …

समझ नहीं आ रहा था की क्या करू

बरसात नहीं होती तो कहीं और चला जाता

पर बरसात रुकने तक तो.यहीं रुकना होगा

फिर सोचा अच्छा है उसके पास मोमबत्ती है

यहाँ कुछ उजाला हो जायेगा

अभी सोच ही रहा था की वो दोनों हाथ में हाथ डाले अन्दर दाखिल हो गए

अब खंडहर का ये कमरा रौशनी से नहा गया

मेरे वाले कौने में अभी भी थोडा अँधेरा था

वो दूसरे कौने में थे

पर उनकी तेज साँसों की आवाज अब साफ़ सुनाई दे रही थी

अन्दर आने पर घुड़सवार ने पुछा

तुम भीगी तो नहीं ?

उसने कहा नहीं और आप ?

नहीं !

अच्छा ये बताओ कहाँ थे आप, देर क्यों कर दी इतना आने में

कल दूर गाँव चला गया था आने में देरी हो गयी

आप को याद तो था न की आज श्रावण पूर्णिमा है ?

नहीं याद होता तो आता क्या?

मैं तो निराश हो चली थी लगा पिछली बार की तरह इस बार भी नहीं आओगे

अब उसे याद कर क्या फायदा

उसने कोई जवाब नहीं दिया

घुड़सवार बोला पिता जी ने आने नहीं दिया

अब आप कोई दूध पीते बच्चे है जो पिता जी से पूछ कर ही काम करेंगे

नहीं, पर पिता जी की इज्जत तो करनी चाहिए न

हूँ… पता है मैं पो फटने तक तुम्हारी राह देखती रही और रुक जाती पर लगा घर पर वो उठ न जाये और मुझे वहां न पा कुछ शोर शराबा न करे

मैं जरूर आता पर….

एक ही दिन तो मिलता है साल में … तुम भी न ..

गलती हो गयी … आज आया न… अब याद से आऊँगा

तुम भी न बस…. वो बोली

अरे बाबा अब कान पकडूँ क्या ?

मैं भी पागल हूँ जो तुमसे इतना प्यार करती हूँ, कोई और होता तो…

मैं भी तो तुम्हे चाहता हूँ, पता है पिता जी नाराज होंगे फिर भी चला आया

जानते हो कई बार लगता है की मुझसे गलती हो गयी

क्यों

मुझे नहीं भागना चाहिए था पापा को नाराज नहीं करना चाहिए था

पर तुम भी जानते हो की पापा कभी मानते नहीं

हाँ वो तो है

दिल की खातिर दिल पर पत्थर रखना पड़ता है अक्सर ..

हाँ…

क्या पापा अभी भी मुझ से नाराज हैं

शायद… उन्होंने तुम्हारे लिए क्या क्या सोचा था

पर मुझे किसी राजकुमार से शादी नहीं करनी थी

वो तुम्हारी सोच थी… पापा तो तुम्हारे लिए अच्छा ही सोचेंगे न

पर … मेरे लिए क्या अच्छा है ये मेरे से बेहतर कौन जान सकता है

क्या तुम्हे अभी भी लगता है की तुमने सही किया.. कोई शिकवा कोई गिला नहीं…

शायद हाँ… या फिर शायद नहीं … बताना मुश्किल है

अगर तुम घर से भागी नहीं होती तो हमें ऐसे छुप के नहीं मिलना पड़ता

हाँ ये तो है

कितना इंतज़ार रहता है इस सावन की पूर्णिमा का …. हर साल

मुझे भी ..

अगर दोनों में से कोई भी न आ पाए तो कितना बुरा लगता है

सो तो है

क्या इसका कोई उपाय नहीं है ?

दोनों की बातचीत सुन मेरी उत्सुकता और बढ़ने लगी

हाय, कितने परेशान हैं दोनों ..

किसी कुलीन घर के लगते हैं…

क्या इनकी मदद की जा सकती है …

परे कैसे…

मुझे तो इनकी पूरी कहानी भी नहीं पता …

कहानी छोड़ो मुझे तो नाम और पता भी नहीं मालूम…

क्या पूछ लूं…

अपने में इतने उलझे हुए हैं की कमरे में मेरी मौजूदगी का भी इन्हें पता नहीं…

शायद मैं रौशनी के दायरे से बाहर हूँ इसलिए…

क्या इन्हें अपनी मौजूदगी का एहसास करवाऊं…

पर उसे तो मालूम था ?

उसने तो मुझे देखा था ? या फिर शायद नहीं ?

तो मेरी तरफ क्यों आ रही थी ?

क्या उसे बहम हुआ था ?

मुझे वो समझ रही थी ? या फिर आहट से ..

यदि मैं अचानक सामने आ गया तो कहीं चोंक तो नहीं जायेंगे..

क्या पौ फटने का इंतज़ार करूं ?

कितने सवाल मन में चल रहे थे ….

जवाब अभी भी कोई नहीं…

अभी में सोच ही रहा था की

घुड़सवार बोला इसी आस में तो बैठे हैं की कोई उपाय निकल आये तुम घर आ पायो

हाँ मैं भी यही चाहती हूँ, पापा को देखे कितने वर्ष हो गए है

हाँ, वो भी काफी चुप रहने लगे हैं

क्या मैंने गलत किया? उसने पूछा

गलत सही को परिभाषित नहीं क्या जा सकता

बिलकुल किया जाता है तभी तो पापा नाराज है

पापा की नाराजगी अपने सामाजिक अपमान से है

वो इसे अपमान समझते हैं इस लिए

उन्हें समाज जो समझाता है वो समझते हैं, हम सब सामाजिक प्राणी हैं

भाड़ में गया ऐसा समाज, रस्मो रिवाज

तो तुम खुश हो?

ख़ुशी को भी परिभाषित नहीं किया जा सकता, मेरी जो किस्मत में था मिला

यानि तुम खुश नहीं हो

मैंने कहा न मेरी येही नियति थी

इतना कह कर वो बाहर अन्धकार की और देखने लगी

बाहर बरसात अब मूसलाधार हो चुकी थी

वातावरण में सौंधी मिट्टी की खुशबू के साथ रिश्तों की गर्माहट और मनोभाव के भारीपन का अहसास भी होने लगा था

कितने कच्चे होते हैं ये रिश्तों के धागे

झट से टूट जाते हैं

कितना मुश्किल है रिश्तों के मोतियों को धागों में पिरो के रखना ..

मनुष्य क्या सोचता है पर क्या हो जाता है

क्या होनी पर किसी का बस नहीं है

क्या हम सब कठपुतली हैं

जैसे  नचाया जाता है नाच जाते हैं

समय पर किसी का अंकुश नहीं है ?

क्या बीता समय कभी वापस नहीं आता ?

क्या हैं ये आवेश, उमंग, आवेग

क्या करवा देते हैं यह

क्यों नहीं मनुष्य अपने जज्बात पर कबो रख पाता

ऐसे पता नहीं कितने सवाल दिमाग में चलने लगे

रात गहराती जा रही थी

विडंबना भी तीव्र होती जा रही थी

मैं भी कहाँ फस गया

क्या जरूरत थी ये रास्ता लेने की

सबने मना किया था लेकिन मेरी जिद्द

किस्मत ही फूटी थी

और ऊपर से बरसात को भी अभी आना था

लेकिन अगर बरसात कहीं और आई होती तो

यहाँ तो कम से कम सर ढकने की जगह तो है

भीग तो नहीं रहे

और साथ भी है

हें ये भी कोई साथ है

ये तो अपनी दुनिया में मस्त हैं

इन्हें तो अपने आसपास का भी ध्यान नहीं है

मैं तो जैसे यहाँ हूँ ही नहीं

भाड़ में गए ये दोनों

बस बरसात रुके और में निकलू

पर ये बरसात है की थमने का नाम ही नहीं ले रही

लगता है पूरी रात यहीं इनके साथ गुजारनी पड़ेगी

क्या मैं इनसे बात करूं

या फिर इतनी उत्सुकता अच्छी नहीं

इन दोनों में कितना प्यार है पर देखो साल में केवल एक दिन ही मिल पाते है

अरे, ये एक दिन तो मिलते है

आजकल तो एक छत के नीचे रहने वाले लोग अजनबी होते है

अपने पड़ोस  के लल्लन को ही देख लो

पति पत्नी एक दुसरे से ही अनजान है

पत्नी को अपनी किटी से फुर्सत नहीं रहती

और लल्लन जी वो तो अपनी सेक्रेटरी से ही इश्क फरमाते रहते है

दोनों को एक दूसरे की बिलकुल कोई चिंता ही नहीं है

घर में चूल्हा जले या न जले रोज नए कपडे पहन श्रृंगार कर लल्लन जी की श्रीमती पत्ते खेलने में लगी रहती हैं

और उनके बच्चे

बबलू और गुड्डी पूरे समय फोन पर ही लगे रहते हैं

आज कल तो उनकी सुप्रभात और शुभ रात्रि भी व्हाट्स एप पर होती है

साल के ३६५ दिन बनावटी जिन्दगी जीने से तो ये अच्छे है कम से कम एक दिन तो गले मिल कर शिकवे गिले दूर करते हैं

परन्तु क्या इनकी मदद की जा सकती है ?

यदि हाँ तो कैसे

समय के चक्र को क्या वापस घुमाया जा सकता है

कोई उपाय

सुनने से तो लगता है की इनके पिता अभी भी खिलाफ हैं

और इसका पति भी

नहीं तो चुप के यहाँ खंडहर में मिलने क्यों आती

ये चार तो चार दिशाएं हैं जो कभी नहीं मिल सकती

कोशिश व्यर्थ हो जाएँगी

परन्तु मनुष्य का कार्य तो प्रयत्न करना ही है

फल प्राप्ति के लिए कर्म तो करना पड़ेगा

कलयुग जो है

सब नियति पर नहीं छोड़ा जा सकता

पर ऐसा नहीं है की इन्होने प्रयत्न नहीं किया होगा

या फिर इनकी परिस्थितिया प्रतिकूल रही होंगी

या फिर संवाद नहीं कर पाए होंगे

कुछ तो है

इनकी कहानी जाने बिना कुछ कहा नहीं जा सकता

अभी दिमाग में से सब सवाल कौंध ही रहे थे की बाहर से एक आहट आई

ऐसा लगा की जैसे कोई आया हो

टूटे कमरे के बाहर एक और धीमी रौशनी की किरण दिखाई दी

जो धीरे धीरे पास आ रही थी

उन दोनों का ध्यान भी आहट से भटका और वो भी उसी और देखने लगे

दोनों के चेहरों पर अचानक घबराहट झलकने लगी

रौशनी एक लालटेन से आ रही थी और वो लालटेन किसी स्त्री के हाथ में थी

लाल शादी के जोड़े में लिपटी कोई युवती

शक्ल ठीक से दिख नहीं रही थी

वो भी अब कमरे के अन्दर दाखिल हो गयी

कमरे में प्रकाश अब बढ गया था

उसे देखते ही दोनों चौंके और उनके मुह से एक साथ निकला

रेवती ….तुम यहाँ….

रेवती  का भीगा यौवन देखते ही बनता था

गोरा रंग, सुडौल बदन

तीखे, नाक नक्श, काली गहरी आंखे

बालों से टपकती पानी की बूंदे …

गुथे हुए बालों पर हीरे के लर चंद्रमा के समान प्रतीत होती थी

सौन्दर्य की मूर्ती थी वो

आँखे जैसे टिक गयी थी … बस देखते रहने का ही मन कर रहा था ..

उसे देख एक अजीब सा नशा सा छा गया

नशा बहुत देर पर टिक न सका

वो उनसे बोली मुझे लगा था की तुम यहीं मिलोगे

हाँ पर तुम्हे आने की क्या जरूरत थी

मेरा भी मन तुमसे मिलने को करता है .. और तुम हो की

तुम जानती हो की मैं रोज नहीं निकल सकता …

हाँ.. और इसी लिए मैं आज यहाँ आई हूँ

आओ रेवती तुम भी बैठ जाओ

हम लोग भी बस बरसात रुकने का इन्तजार कर रहें हैं

कैसे हो तुम लोग,.सुनंदा को तो आज सदियों बाद देखा है, बिलकुल नहीं बदली है और शिवेंद्र तुम कुछ परेशान लग रहे हो

तुम भी बिलकुल नहीं बदली रेवती, समय के साथ तुम्हारा सोंदर्य तो निखरता ही जा रहा है, पर कितने अभागे है हम ..

सब समय का खेल है शिवेंद्र हमारे चाहे से कुछ नहीं होता

मैंने तुमसे प्यार किया है और आगे भी करती रहूंगी जब भी हूँगी तो सिर्फ तुम्हारी׀

तुम दोनों की जोड़ी कितनी सुन्दर लगती है मैं भगवान से मनाऊंगी के तुम दोनों किसी जनम में तो एक हो जाओ

शिवेंद्र बोला, हमारी कहानी तो लगता है अधूरी रह जाएगी

चिंता क्यों करते हो शिवेंद्र ऐसा नहीं है की हम जिन्दगी भर बस भटकते ही रहेंगे, रेवती बोली, किसी न किसी दिन तो अखंडेश्वर महादेव का शिवलिंग मिलेगा, लोग उसे स्थापित करेंगे और हम इन बन्धनों से मुक्ति पा जायेंगे

सुनंदा ने पूछा की वो शिवलिंग कहाँ दबा है और कैसे मिलेगा

शिवेंद्र ने बताया की यहाँ इस खंडहर में १०० मीटर दूर सूखा कुआँ है वो शिवलिंग उसी मैं है परन्तु चूँकि अब यहाँ कोई आता नहीं है और कुआँ भी पौधों से ढक गया है इसलिए बहुत मुश्किल  है पर असंभव नहीं..

सुनंदा बोली तो जिस दिन वो मिल जायेगा हम इन बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे

हाँ

कोई तरीका जिससे हम जल्दी कर सके

रेवती बोली मैंने कोशिश की पर लोग डर के भाग जाते हैं, कोई रुके हमारी बात सुने तो कुछ करे

मैंने सोचा की आज फस ही गया हूँ तो इनकी मदद कर दूँ, शायद खुश हो हीरे मोतियों का पता बता दें सुना है बहुत धन गडा है इस खण्डहर मैं

धन का लालच आदमी से क्या न करवा दे

लालच के आगे डर भी भाग जाता है और भूत भी

दोस्त परिवार सब भुला देता है धन का भूत

जिन्दगी बदल देता है, भूत बना देता है

तो क्या में खंडहर में दबे धन का पता पूछ इनकी मदद करूं

इसमें दोनों का फायदा है

बरसात भी अब रक सी रही थी पौ फटने ही वाली थी

मैं अभी दुविधा में था की वो बोली

सुबह होने को है मुझे जाना होगा लाओ तुम्हे राखी तो बांध दूँ

उसने अपना हाथ हवा में लहराया और कहीं से एक थाली उसके हाथ  में आ गयी

उसने कुमकुम से शिवेंद्र को तिलक लगाया

और उसके हाथ पर राखी बाँधी

भाई बहन का ये प्यार देख मुझसे नहीं रहा गया

मैंने गला खखारा

और उन तीनो का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित हो गया

सुनंदा ने अपनी मोमबत्ती मेरी तरफ बढाई

रौशनी का दायरा बढ़ा और उन तीनो की नजर मुझ पर पड़ी

मुझे देखते ही तीनो घबरा से गए

चेहरे सफ़ेद पड़ गए, फक्क सफ़ेद

किसी के मुह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी

मैंने सोचा की ये सन्नाटा मुझे ही तोडना पड़ेगा

नमस्कार

मेरा नाम विशेष है और मैं पास गाँव का रहने वाला हूँ

मैं बरसात से बचने इस खंडहर में आया था

काफी देर से आप लोगो की बातें सुन रहा हूँ

उत्सुकता के मारे रहा नहीं गया तो …सोचा परिचय दे दूँ

तीनो ने एक दूसरे की तरफ देखा

आँखों में कुछ इशारे हुए

और शिवेंद्र बोला ..

मेरा नाम शिवेंद्र है और में विजयगढ़ का राजकुमार हूँ

ये मेरी बहन सुनंदा है और यह रेवती, चोपनगढ़ की महारानी

हें, यह कैसे हो सकता है अब तो न कोई विजयगढ़ है और न ही चोपन गढ़

राजा रजवाड़ों को ख़त्म हुए अब सालों बीत गए ..

मैंने सोचा

क्या ये सच में प्रेतात्मा है ?

इसीलिए मुक्ति की बाते कर रहे थे

अखंडेश्वर महादेव के शिवलिंग वाली ?

अब मुझे थोडा डर सा लगने लगा

जाने क्या करेंगे मेरा ये लोग

मैं एक और ये तीन, तलवार भी है इसके पास

माफ़ी चाहूँगा पर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया

मैंने आप लोगो की बातें सुनी

मैं आप की मदद करना चाहता हूँ

आप बताएं की मैं कैसे आप की मदद कर सकता हूँ

शिवेंद्र बोला

आपका बहुत धन्यवाद, आज तक हमसे सब दूर भागते रहे

किसी ने मदद करने की नहीं सोची

आप पहले हैं

अब सुनंदा बोली

आप यदि हमारी मदद करना चाहते हैं तो अखंडेश्वर महादेव का शिवलिंग उस पुराने कुँए से निकाल स्थापित कर दे

कौन सा पुराना कुआँ

वोही जो इस खंडहर से १०० मीटर दक्षिण में है

मैं तो आज यहाँ पहली बार आया हूँ भटकते हुए

मुझे तो कोई कुआँ वूआ नहीं दिखा

रेवती अपनी खनकती आवाज में बोली

दिखेगा कैसे वो तो अब झाड झंकारो से ढका है

अच्छा मैं कल ढूंढता हूँ मिल गया तो आप का काम करने की कोशिश करूंगा

सुनंदा बोली आप का बहुत उपकार होगा हम ५०० सालों से यहीं भटक रहे हैं

५०० साल !! इसका मतलब ये सब भूत हैं

मैं इतनी देर से भूतों के बीच में था ?

और कैसे भूत हैं ये

ये तो मनुष्य से ज्यादा परेशान हैं

हाँ, परेशान नहीं होते तो भूत क्यों बनते

इच्छाएँ पूरी नहीं हूईं इसी लिए तो मुक्ति नहीं मिली

ये इच्छाएँ भी क्या चीज होती हैं

अच्छे भले आदमी को भूत बना देती है

पर मनुष्य वो कब इच्छाओं पर काबू पाता है

आज ये तो कल वो

सब चाहिए इसे

कभी खुश नहीं रह सकता

अपने पडोसी लल्लन को ही लो

बीवी और सेक्रेटरी से ही उसका काम नहीं चलता

अपने मोहल्ले  की रेखा

दिल्ली मैं नेहा, मुंबई मैं कनिका

और गोवा में तो हर बार नयी फ़ोन करके बुलाते है

इसके बावजूद भी मन नहीं भरता

और ननकू, सुबह से शाम गद्दी पर बैठा रहता है

सिर्फ पैसा कमाने के कोई काम नहीं, पता नहीं कितना जमा कर के रखा है

क्या करेगा पता नहीं

सबका वोही हाल है

फिर सोचा मैं भी कौन अलग हूँ मेरे मन मैं भी तो लालच है

वरना कौन भूतो के मुह लगता है

मैंने शिवेंद्र से कहा

मैं सुबह होते ही शिवलिंग ढूँढने पर लग जाऊँगा

कुआँ कितना गहरा है क्या तुम्हे पता है

उसमे और क्या है ?

मुझे पता होगा तो काम थोडा जल्दी हो जायेगा

रस्सी, फावड़ा किस चीज की जरूरत होगी

रेवती बोली

ये चोपन गढ़ का किला कभी आबाद था जब मुगलों ने आक्रमण किया था तो उन्होंने अपना सारा धन और शिवलिंग कुएं में डाल दिया था आक्रमण के बाद कोई नहीं बचा

वो धन और शिवलिंग अभी भी उसी कुँए में है सारे हीरे जवाहरात अशर्फियाँ सभी…

उन्होंने? मैंने पुछा

हाँ राजा आदित्य नारायण मेरे पति

इसका पति? मैंने सोचा

अभी तो ये शिवेंद्र से इश्क लड़ा रही थी ? ये क्या चक्कर हैं

इनके रिश्तों को समझते समझते कहीं मैं घन चक्कर न बन जाऊं

पर क्या जरूरत है किसी के रिश्ते समझने की

अपने को तो दौलत से मतलब है

मिल गयी तो लल्लन और ननकू हैरान रह जायेंगे

मैं भी लल्लन की तरह एक सेक्रेटरी रख लूँगा

हो सकता है ननकू की तरह नोट गिनने की मशीन लगवानी पड़े

पप्पू जैसी ऑडी कार भी खरीदनी है

बीवी भी रोज किट्टी में जाने की जिद करती है

उससे भी मुक्ति मिलेगी

एक ही झटके में सारी समस्याएँ हल हो जाएँगी

इनको भी इनके पापों से मुक्ति मिल जाएगी

खंडहर में शिवलिंग स्थापित होगा और यहाँ भी बहार छा  जाएगी

एक पुजारी को बैठा दूंगा और अफवाह फैला दूंगा की शिवलिंग चमत्कारी है

इसकी पूजा करने से साडी इच्छाओं की पूर्ती होती है

जो इन तीनो की कहानी सुनेगा उसे विश्वास हो जायेगा

कोई एक आध कहानी और मनघडंत जोड़ देंगे

अच्छी कमाई हो जाएगी चढ़ावे से

मंदिर से अच्छा तो कोई कमाई का साधन ही नहीं है कलयुग में

दस  रूपए से कम तो कोई चढ़ाता ही नहीं

बाहर एक फूल और प्रशाद की दूकान भी खुलवा दूंगा

उससे भी कमीशन आ जाएगी

और एक जलपान गृह जो लोग आएंगे वो कुछ खायेंगे भी तो

दूर से आने वालो के लिए विश्राम गृह

अच्छी कमाई हो जाएगी अखंडेश्वर महादेव से

इस अंध विशवास की दुनिया मैं जितना फायेदा उठा सको उठाना चाहिए

भगवान् क्या हैं एक पत्थर ही तो है

थोडा जल चढाओ चन्दन लगाओ श्रृंगार करो

सब दिखावा ही तो है, ढकोसला

चमत्कार को नमस्कार

कुछ मुश्किल नहीं है बस एक बार शिवलिंग मिल जाये

मैंने उन तीनो को ढाढस बढ़ाते हुए बोला

बस अब पौ फटने वाली है

बरसात भी रुक चली है

सुबह होते ही मैं शिवलिंग ढूँढने पर लग जाऊँगा

और इश्वर ने चाहा तो आप को मुक्ति मिल जाएगी

अब तीनो के चेहरे पर ख़ुशी देखते नहीं बनती थी

और तीनो मेरा धन्यवाद देते नहीं थकते थे

मेरी रूचि भी अब उनकी कहानी में कम और दौलत पाने में ज्यादा थी

मुझे भी बेसब्री से सुबह होने का इंतज़ार था

वो तीनो अब एक दूसरे से विदाई लेने में लगे थे

क्या हमेशा इतनी आत्मीयता से विदाई लेते हैं ?

या फिर आज इसलिए की शायद ये आखिरी मुलाकात हो

कल सुबह तो मैं शिवलिंग ढूंढ स्थापित कर ही दूंगा

ये लोग फिर शायद कभी नहीं मिलेंगे .. या फिर अगले जन्म मैं

सुनंदा बोली भैया अब मैं चलती हूँ उनके उठने से पहले पहुचना जरूरी है नहीं तो चिल्लपों मचाएंगे, जहाँ बिना लड़े झगडे काम हो जाये वहां व्यर्थ में मानसिक उर्जाशक्ति  क्यों नष्ट करें

शिवेंद्र से गले मिलने के बाद वो रेवती की तरफ मुड़ी, बोली तुमसे इतने दिन के बाद मिल अच्छा लगा… तुम दोनों का प्यार देख सिर्फ येही कह सकती हूँ की भगवान् भली करे…

काश तुम मेरी तरह घर से भाग शादी कर लेती … न तुम आत्महत्या करती न भैया …

पर अब इन बातो से क्या? होनी को कौन रोक सका है

भला हो इस भलमानस का जो हमारी मदद कर रहा है

शायद अब मुक्ति मिल ही जाएगी ….

सुनंदा के जाने के बाद रेवती और शिवेंद्र अकेले रह गए

नहीं.. मैं भी वहीँ था पर निगाहें अब उनकी तरफ नहीं थी

अँधेरी छत को देख सोच रहा था की प्यार के लिए लोग क्या क्या करते हैं ..

जिनको प्यार मिल जाता है वो भी अभागे ..जैसे सुनंदा .. पति पाने को पिता और भाई को खो दिया

जिनको न मिले वो भी … जैसे शिवेंद्र और रेवती .. शादी न होने पर  ख़ुदकुशी कर ली ..

कैसी विचित्र दुनिया है यह ..

या फिर प्रकृति का नियम है की कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है

मिलता थोडा है और खोता ज्यादा है

फिर भी मनुष्य है की बाज नहीं आता ..

सब समय का खेल है…

समय का चक्र निरंतर घूमता रहता है ..

अविरल ..बिना रुके निरंतर…

किसी नदी की निर्मल धारा की तरह

क्या इस समय के प्रवाह को बांध बना रोका जा सकता है ?

या फिर ये प्रवाह कुछ क्षण के लिए ही रुकता है ..

इश्वर इतना कठोर क्यों है ?

क्यों नहीं करने देता प्रकृति के साथ छेड़खानी?

होनी क्यों हो के रहती है ?

पहले से क्यों नहीं पता होता की नियति को क्या मंजूर है?

मनुष्य क्यों दूरदर्शी नहीं होता ?

कुछ पल आनंद के बिताने के लिए पूरी जिन्दगी कठिनाई में बिता देता है

क्या आवश्यकता है ?

अभी सारी बाते दिमाग में कौंध ही रही थी की एहसास हुआ की मैं इस खंडहर में अकेला हूँ

सुबह की रौशनी रात के काले अन्धकार को चीरती हुई क्षितिज पर दिखाई दे रही थी

बरसात भी थम गयी थी

आज का दिन बहुत व्यस्त होगा

सूखे कुँए को ढूँढ शिवलिंग जो निकलना है …

चलो ढूंढें उस कुंए को …

सोच कर मैं बाहर निकला

ठंडी हवा के झोंके ने शरीर में सिहरन सी पैदा कर दी

अन्दर कितना अच्छा लग रहा था

धीरे धीरे में उस कुँए के पास पहुंचा

कुआँ लताओं  से घिरा था

मुझे पहले इन लताओं को यहाँ से हटाना होगा

फिर कुँए में उतरना

रस्सी की जरूरत पड़ेगी

इन लताओं को रस्सी की तरफ इस्तमाल किया जा सकता है

शिवलिंग निकाल धन पाने की फितूर सी पैदा हो गयी थी

लालच…

क्या नहीं करवाता ..

जैसा उन्होंने बताया था ठीक वैसा ही लताओं से भरा कुआँ वहां था

मैंने हाथो से कुछ लताएँ  हटाई

एक नुकीला पत्थर उठा के कुछ लम्बी लताएँ काटी

उन को गुथ कर एक रस्सी बनायीं और उसे पेड़ से बाँध कर कुँए में उतरना शुरू कर दिया

इतना आसान न था जैसा लगता था…

तलहटी में पहुंचा तो देखा ..

चरों तरफ सोने चांदी हीरे मोतियों के ढेर लगे थे …

और उन के बीच था ..

अखंडेश्वर महदेव का आलोकिक शिवलिंग

पहले क्या उठाऊँ

जेवरात या शिवलिंग …

सोचा पहले जेवरात ले चलता हूँ उन्हें कहीं छिपा दूंगा

फिर आ शिवलिंग निकल स्थापित कर दूंगा

फिर सोचा शिवलिंग ले चलता हूँ धन तो छुपा ही है

अभी दिमाग में ये सब ख्याल चल ही रहे थे की

किसी ने जोर से झझकोरा

आंख खुली तो देखा दोस्त सामने थे

तुम लोग यहाँ कैसे

वो बोले

तुम यहाँ चैन की बंसी बजा सो रहे हो

और हम सारी रात तुम्हे बियाबान में ढूंढते रहे

कितने परेशान हुए हम बरसात में भीगते हुए

मैंने तुरंत इधर उधर देखा

उस कौने में भी जहाँ शिवेंद्र रेवती और सुनंदा बैठे थे

अभी तो यहीं थे

मैंने देखा था

तो वो सब क्या एक स्वप्न था

सिर्फ स्वप्न …

और क्या स्वप्न भी कभी सच्चे होते हैं

पर जमीन पर वो मोम की बूंदे…..

कहानी- भूत हूँ मैं

032

भाग 1 से भाग ३० तक की कहानी

कहीं दूर घने बियाबान में पायलों की झंकार सुनाई देती हैं ……

दिल तेजी से धड़कने लगता है …..

लो वो आ गयी…… आज फिर

घने जंगले में पेड़ो के झुरमुटों के बीच खंडहर में ….

मोमबत्ती की कापती लों के पीछे वो सफ़ेद साड़ी में दिखती है ….

चेहरा बेतरतीब बालो से ढका है ….

कौन है ये अभागी …. क्यों भटक रही है बियाबान जंगलों में ….

फिर वो बड़ी अदा से अपने बालों को पीछे धकेलती है … और गाना गाना शुरू कर देती है …..

मेरी नज़र अब चेहरे पर ज़ूम होती है…..

और………..

होठों पर लगी लाल लिपस्टिक देखते ही हंसी छूट जाती है

जैसे ही मेरी हंसी निकली, उसका ध्यान मुझ पर गया, वो मेरी तरफ मुड़ी …. घूर के मुझे देखा…

उसकी आंखे… काली रात के अँधेरे की तरह स्याह थी …. उन आँखों में एक अजीब सी उदासी छाई हुई थी ….

मुझे देखते ही उन आँखों में अजीब सी चमक पैदा हुई ….

वो मुड़ी….

और मेरी तरफ बढ़ी…..

ऐसा लगा जैसे वो हवा में तैरती हुई मेरी तरफ बढ रही थी….

दिल की धड़कने और तेज होने लगी …..

लगा की दिल छाती से बाहर निकल आयेगा…

समझ नहीं आ रहा था की क्या करू

पैर जड़ से हो गए थे ….. ऐसे जैसे किसी ने शरीर से पूरा रक्त निकल लिया हो …

तभी सन्नाटे को चीरती हुई एक और गाने की आवाज आई …..

उसका ध्यान मुझ से हटा….

वो इधर उधर देखने लगी…..

मेरी जान में कुछ जान आई…

मैं भी उस आवाज की दिशा में देखने लगा …

स्याह बियाबान में कुछ नहीं दिख रहा था …

चारों तरफ सिर्फ गहन अन्धकार…

घुप्प अँधेरा…

सिवाए उस मोमबत्ती की रौशनी के दायरे के….

उस रौशनी में उसकी सुन्दरता देखते बनती थी …

चेहरे पर पाउडर, लाली, होठों पर लाल लिपस्टिक,… माथे पर अर्धचन्द्राकार चमकीली बिंदी….

मांग में…. मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया…..

मैं अचंभित उसकी ओर टकटकी लगा देखता रहा और वो…

चारो तरफ… जैसे… जैसे किसी को ढूंढ रही हो…..

गाने की आवाज लगातार तीव्र होती जा रही थी

लगता था की गाने वाला हमारी ही तरफ चला आ रहा हो

उस गाने में एक अजीब सी मिठास एक अजीब सी कशमकश ….

अजीब सा दर्द था……

वो भी उस गाने को सुन बैचैन हो उठी थी

तभी…..

बादल कुछ छंटे और चंद्रदेव की शीतल किरणों ने कुछ अन्धकार को चीरा

खण्डहर पर चांदनी पुलकित हो उठी ..

आज पूर्णिमा की रात है ,,,

मैंने मन में सोचा…

अच्छा है, यदि अमावस होती तो?

वो हैरान परेशान इधर उधर देख रही थी

गाने की आवाज अचानक बंद हो गयी …

और घोड़े की टापों ने उसकी जगह ले ली..

टप, टप टप टप….

घोडा हमारी तरफ ही बढ रहा था …

जैसे जैसे टापों की आवाज तेज होती जा रही थी…

उसकी बैचेनी भी बढती जा रही थी ….

अब उसका पूरा ध्यान .. उस घोड़े की तरफ था…

और मैं सिर्फ एक अवेक्षक की तरह …

उसकी खूबसूरती को निहारता चला जा रहा था …

कौन है ये खूबसूरत अबला?

क्या कर रही है इस बियाबान में ?

टोर्च के ज़माने में मोमबत्ती क्यों लिए है ?

तेज हवा के झोंके चल रहे है …

लौ कंप रही है….

पर मोमबत्ती है की बुझती ही नहीं?..

हमारी तो तुरंत बुझ जाती है…

क्या सुंदरी किसी का इंतज़ार कर रही है

कौन है वो जो घोड़े पर चढ़ कर आ रहा है?

क्या कोई राजकुमार?

या कोई दूल्हा? अब राजकुमार कहाँ होते हैं..

तमाम सवाल मन में चल रहे थे

जवाब…

कोई नहीं…

द्रश्यता बढ़ने पर भी सिर्फ मैं, वो और घोड़े की टाप ही सुनाई देती थी

समय की सुई जैसे अटक गयी हो

समय बीते नहीं बीतता था …

उत्सुकता बढती जा रही थी …

जानना जरूरी था की चल क्या रहा है यहाँ ?

हिम्मत बांध मैंने आगे बढ़ना शुरू किया

पर पैर जैसे पत्थर…

शने शने आगे बढ़ा

घोड़े की टाप भी तेज हो रही थी

गाने की आवाज फिर आने लगी …

अब आवाज पास आती जा रही थी….

दूर झुरमुटों से निकल एक घुड़सवार आते दिखा…

उसे देखते ही सुंदरी की काली गहरीली आंखे … लाल हो गयी…

जैसे उनमे खून उतर आया हो

घुड़सवार सुंदरी की तरफ बढ रहा था …

और वो उसकी तरफ

मेरी तरफ अब किसी का ध्यान नहीं था.

घुडसवार मुझ से अभी भी कुछ दूरी पर था

कुछ साफ़ नजर नहीं आ रहा था

सफ़ेद घोड़े पर चमकीले भड़कीले कपडे पहने वो कोई राजकुमार लग रहा था

हाँ…. उसकी कमर में तलवार भी लटकी है

पर आजकल तो चमकीले कपडे पहन तलवार लटकाए घोड़ी पर तो दुल्हे बैठते हैं…

ऐसा तो नहीं की ये किसी शादी में मंडप से भाग आया हो ?

कहीं ऐसा तो नहीं की इसकी शादी जबरदस्ती कहीं कराई जा रही हो

ये इसकी प्रेमिका तो नहीं?

फिर प्रश्न

जवाब अभी भी कोई नहीं

अब घोड़े की गति धीमी हो रही थी जैसे जैसे वो उसके पास आ रहा था

सुंदरी की काली स्याह आँखे अब और लाल होने लगी थी

अंगारों की तरह लाल ऐसा लगता था की अब अंगारे बरसेंगे

उसने अपने  मोमबत्ती वाले हाथ की कलाई की तरफ देखा …

पर उसमे घडी नहीं थी… चूड़ियाँ भी नहीं थी

कलाई नंगी थी

तो फिर …

क्यों देख रही थी वो अपनी कलाई की तरफ?

शायद आदत से मजबूर है

मैंने सोचा

आज घडी पहनना भूल गयी होगी

दोनों के बीच कुछ तो है यह तो अब स्पष्ट हो गया था

परन्तु क्या ?

अभी में सोच ही रहा था तब तक वो फिर उस घुड़सवार को देखने लगी

दोनों एक दूसरे की तरफ बढ रहे थे

खंडहर के बीचोबीच चांदनी में अब सब साफ़ दिखाई दे रहा था

घोडा उसके करीब आ चुका था

वो थम गया था

सुंदरी के पास पहुचने पर वो घोड़े से उतरा …

अब दोनों एक दूसरे की तरफ बढे…

हवा में उड़ते हुए से….

बाहुपाश में समां गए

समय जैसे थम सा गया

दोनो अब आलिंगन मुक्त होने का नाम ही नहीं ले रहे थे

चारो तरफ सन्नाटा बियाबान

और ये दोनों दिन दुनिया से बेखबर….अपने में मशगूल

यहाँ तक की मुझे भी जैसे भूल गयी थी वो …

पक्का ये दो प्रेमी हैं

लगता है जन्मो बाद मिले हैं

जन्मो बाद? कितने जन्मो बाद?

मैं अभी ये सब सोच ही रहा था की बदल फिर से छाने लगे

काली घनघोर घटाएँ उमड़ने लगी

वैसे ही जैसे इन दो प्रेमियों से प्रेरित हो उमड़ रही हों

हवा के झोंके तेज होने लगा

मैंने सोचा इस बरसात अब आने ही वाली है

जल्दी से कोई ठिकाना ढूँढ लेता हूँ

वरना भीग जाऊँगा, सर्दी भी लग सकती है

इन दोनों का चक्कर छोड़ो

मैं खण्डहर की तरफ बढ़ने लगा

एक टूटे कमरे में इकलोती टूटी छत के नीचे जा खड़ा हुआ

हवा यहाँ भी आ रही थी

धीमी फुआर भी पड़ने लगी थी

मौसम सुहाना होता जा रहा था

अँधेरा बढ रहा था ..

और मोमबत्ती …

वो तो उसके पास है ..

ध्यान फिर उन्ही दोनों की तरफ चला गया

क्या कर रहे हैं दोनों ?

क्या अभी तक आलिंगनबध हैं ?

उत्सुकता कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी

मैं फिर कौने में टूटी दीवार की तरफ बढ़ा

मोमबत्ती की रौशनी का दयारा अभी भी उतना ही था

लौ अभी भी कांप रही थी

बारिश की बूंदों से उनकी भी एकाग्रता भंग हुई

वो उससे कुछ बोली

कुछ साफ़ सुनाई नहीं दिया

उसने हाँ में सर हिलाया और वो दोनों अब उसी स्थान की तरफ बढ़ने लगे जहाँ में पहले से ही बारिश से बचने सर छुपाये हुए था

शने शने वो मेरी तरफ बढ रहे थे

उन दोनों को अपनी तरफ आता देख मेरी उत्सुकता बढ रही थी

सोचा पूछ लूँगा की इस भयावय रात में वो यहाँ क्या कर रहे हैं

फिर लगा कहीं उन्हें बुरा न लग जाये

या फिर बोले “माइंड योर बिज़नस”

किरकिरी हो जाएगी …

समझ नहीं आ रहा था की क्या करू

बरसात नहीं होती तो कहीं और चला जाता

पर बरसात रुकने तक तो.यहीं रुकना होगा

फिर सोचा अच्छा है उसके पास मोमबत्ती है

यहाँ कुछ उजाला हो जायेगा

अभी सोच ही रहा था की वो दोनों हाथ में हाथ डाले अन्दर दाखिल हो गए

अब खंडहर का ये कमरा रौशनी से नहा गया

मेरे वाले कौने में अभी भी थोडा अँधेरा था

वो दूसरे कौने में थे

पर उनकी तेज साँसों की आवाज अब साफ़ सुनाई दे रही थी

अन्दर आने पर घुड़सवार ने पुछा

तुम भीगी तो नहीं ?

उसने कहा नहीं और आप ?

नहीं !

अच्छा ये बताओ कहाँ थे आप, देर क्यों कर दी इतना आने में

कल दूर गाँव चला गया था आने में देरी हो गयी

आप को याद तो था न की आज श्रावण पूर्णिमा है ?

नहीं याद होता तो आता क्या?

मैं तो निराश हो चली थी लगा पिछली बार की तरह इस बार भी नहीं आओगे

अब उसे याद कर क्या फायदा

उसने कोई जवाब नहीं दिया

घुड़सवार बोला पिता जी ने आने नहीं दिया

अब आप कोई दूध पीते बच्चे है जो पिता जी से पूछ कर ही काम करेंगे

नहीं, पर पिता जी की इज्जत तो करनी चाहिए न

हूँ… पता है मैं पो फटने तक तुम्हारी राह देखती रही और रुक जाती पर लगा घर पर वो उठ न जाये और मुझे वहां न पा कुछ शोर शराबा न करे

मैं जरूर आता पर….

एक ही दिन तो मिलता है साल में … तुम भी न ..

गलती हो गयी … आज आया न… अब याद से आऊँगा

तुम भी न बस…. वो बोली

अरे बाबा अब कान पकडूँ क्या ?

मैं भी पागल हूँ जो तुमसे इतना प्यार करती हूँ, कोई और होता तो…

मैं भी तो तुम्हे चाहता हूँ, पता है पिता जी नाराज होंगे फिर भी चला आया

जानते हो कई बार लगता है की मुझसे गलती हो गयी

क्यों

मुझे नहीं भागना चाहिए था पापा को नाराज नहीं करना चाहिए था

पर तुम भी जानते हो की पापा कभी मानते नहीं

हाँ वो तो है

दिल की खातिर दिल पर पत्थर रखना पड़ता है अक्सर ..

हाँ…

क्या पापा अभी भी मुझ से नाराज हैं

शायद… उन्होंने तुम्हारे लिए क्या क्या सोचा था

पर मुझे किसी राजकुमार से शादी नहीं करनी थी

वो तुम्हारी सोच थी… पापा तो तुम्हारे लिए अच्छा ही सोचेंगे न

पर … मेरे लिए क्या अच्छा है ये मेरे से बेहतर कौन जान सकता है

क्या तुम्हे अभी भी लगता है की तुमने सही किया.. कोई शिकवा कोई गिला नहीं…

शायद हाँ… या फिर शायद नहीं … बताना मुश्किल है

अगर तुम घर से भागी नहीं होती तो हमें ऐसे छुप के नहीं मिलना पड़ता

हाँ ये तो है

कितना इंतज़ार रहता है इस सावन की पूर्णिमा का …. हर साल

मुझे भी ..

अगर दोनों में से कोई भी न आ पाए तो कितना बुरा लगता है

सो तो है

क्या इसका कोई उपाय नहीं है ?

दोनों की बातचीत सुन मेरी उत्सुकता और बढ़ने लगी

हाय, कितने परेशान हैं दोनों ..

किसी कुलीन घर के लगते हैं…

क्या इनकी मदद की जा सकती है …

परे कैसे…

मुझे तो इनकी पूरी कहानी भी नहीं पता …

कहानी छोड़ो मुझे तो नाम और पता भी नहीं मालूम…

क्या पूछ लूं…

अपने में इतने उलझे हुए हैं की कमरे में मेरी मौजूदगी का भी इन्हें पता नहीं…

शायद मैं रौशनी के दायरे से बाहर हूँ इसलिए…

क्या इन्हें अपनी मौजूदगी का एहसास करवाऊं…

पर उसे तो मालूम था ?

उसने तो मुझे देखा था ? या फिर शायद नहीं ?

तो मेरी तरफ क्यों आ रही थी ?

क्या उसे बहम हुआ था ?

मुझे वो समझ रही थी ? या फिर आहट से ..

यदि मैं अचानक सामने आ गया तो कहीं चोंक तो नहीं जायेंगे..

क्या पौ फटने का इंतज़ार करूं ?

कितने सवाल मन में चल रहे थे ….

जवाब अभी भी कोई नहीं…

अभी में सोच ही रहा था की

घुड़सवार बोला इसी आस में तो बैठे हैं की कोई उपाय निकल आये तुम घर आ पायो

हाँ मैं भी यही चाहती हूँ, पापा को देखे कितने वर्ष हो गए है

हाँ, वो भी काफी चुप रहने लगे हैं

क्या मैंने गलत किया? उसने पूछा

गलत सही को परिभाषित नहीं क्या जा सकता

बिलकुल किया जाता है तभी तो पापा नाराज है

पापा की नाराजगी अपने सामाजिक अपमान से है

वो इसे अपमान समझते हैं इस लिए

उन्हें समाज जो समझाता है वो समझते हैं, हम सब सामाजिक प्राणी हैं

भाड़ में गया ऐसा समाज, रस्मो रिवाज

तो तुम खुश हो?

ख़ुशी को भी परिभाषित नहीं किया जा सकता, मेरी जो किस्मत में था मिला

यानि तुम खुश नहीं हो

मैंने कहा न मेरी येही नियति थी

इतना कह कर वो बाहर अन्धकार की और देखने लगी

बाहर बरसात अब मूसलाधार हो चुकी थी

वातावरण में सौंधी मिट्टी की खुशबू के साथ रिश्तों की गर्माहट और मनोभाव के भारीपन का अहसास भी होने लगा था

कितने कच्चे होते हैं ये रिश्तों के धागे

झट से टूट जाते हैं

कितना मुश्किल है रिश्तों के मोतियों को धागों में पिरो के रखना ..

मनुष्य क्या सोचता है पर क्या हो जाता है

क्या होनी पर किसी का बस नहीं है

क्या हम सब कठपुतली हैं

जैसे  नचाया जाता है नाच जाते हैं

समय पर किसी का अंकुश नहीं है ?

क्या बीता समय कभी वापस नहीं आता ?

क्या हैं ये आवेश, उमंग, आवेग

क्या करवा देते हैं यह

क्यों नहीं मनुष्य अपने जज्बात पर कबो रख पाता

ऐसे पता नहीं कितने सवाल दिमाग में चलने लगे

रात गहराती जा रही थी

विडंबना भी तीव्र होती जा रही थी

मैं भी कहाँ फस गया

क्या जरूरत थी ये रास्ता लेने की

सबने मना किया था लेकिन मेरी जिद्द

किस्मत ही फूटी थी

और ऊपर से बरसात को भी अभी आना था

लेकिन अगर बरसात कहीं और आई होती तो

यहाँ तो कम से कम सर ढकने की जगह तो है

भीग तो नहीं रहे

और साथ भी है

हें ये भी कोई साथ है

ये तो अपनी दुनिया में मस्त हैं

इन्हें तो अपने आसपास का भी ध्यान नहीं है

मैं तो जैसे यहाँ हूँ ही नहीं

भाड़ में गए ये दोनों

बस बरसात रुके और में निकलू

पर ये बरसात है की थमने का नाम ही नहीं ले रही

लगता है पूरी रात यहीं इनके साथ गुजारनी पड़ेगी

क्या मैं इनसे बात करूं

या फिर इतनी उत्सुकता अच्छी नहीं

इन दोनों में कितना प्यार है पर देखो साल में केवल एक दिन ही मिल पाते है

अरे, ये एक दिन तो मिलते है

आजकल तो एक छत के नीचे रहने वाले लोग अजनबी होते है

अपने पड़ोस  के लल्लन को ही देख लो

पति पत्नी एक दुसरे से ही अनजान है

पत्नी को अपनी किटी से फुर्सत नहीं रहती

और लल्लन जी वो तो अपनी सेक्रेटरी से ही इश्क फरमाते रहते है

दोनों को एक दूसरे की बिलकुल कोई चिंता ही नहीं है

घर में चूल्हा जले या न जले रोज नए कपडे पहन श्रृंगार कर लल्लन जी की श्रीमती पत्ते खेलने में लगी रहती हैं

और उनके बच्चे

बबलू और गुड्डी पूरे समय फोन पर ही लगे रहते हैं

आज कल तो उनकी सुप्रभात और शुभ रात्रि भी व्हाट्स एप पर होती है

साल के ३६५ दिन बनावटी जिन्दगी जीने से तो ये अच्छे है कम से कम एक दिन तो गले मिल कर शिकवे गिले दूर करते हैं

परन्तु क्या इनकी मदद की जा सकती है ?

यदि हाँ तो कैसे

समय के चक्र को क्या वापस घुमाया जा सकता है

कोई उपाय

सुनने से तो लगता है की इनके पिता अभी भी खिलाफ हैं

और इसका पति भी

नहीं तो चुप के यहाँ खंडहर में मिलने क्यों आती

ये चार तो चार दिशाएं हैं जो कभी नहीं मिल सकती

कोशिश व्यर्थ हो जाएँगी

परन्तु मनुष्य का कार्य तो प्रयत्न करना ही है

फल प्राप्ति के लिए कर्म तो करना पड़ेगा

कलयुग जो है

सब नियति पर नहीं छोड़ा जा सकता

पर ऐसा नहीं है की इन्होने प्रयत्न नहीं किया होगा

या फिर इनकी परिस्थितिया प्रतिकूल रही होंगी

या फिर संवाद नहीं कर पाए होंगे

कुछ तो है

इनकी कहानी जाने बिना कुछ कहा नहीं जा सकता

अभी दिमाग में से सब सवाल कौंध ही रहे थे की बाहर से एक आहट आई

ऐसा लगा की जैसे कोई आया हो

टूटे कमरे के बाहर एक और धीमी रौशनी की किरण दिखाई दी

जो धीरे धीरे पास आ रही थी

उन दोनों का ध्यान भी आहट से भटका और वो भी उसी और देखने लगे

दोनों के चेहरों पर अचानक घबराहट झलकने लगी

रौशनी एक लालटेन से आ रही थी और वो लालटेन किसी स्त्री के हाथ में थी

लाल शादी के जोड़े में लिपटी कोई युवती

शक्ल ठीक से दिख नहीं रही थी

वो भी अब कमरे के अन्दर दाखिल हो गयी

कमरे में प्रकाश अब बढ गया था

उसे देखते ही दोनों चौंके और उनके मुह से एक साथ निकला

रेवती ….तुम यहाँ….

रेवती  का भीगा यौवन देखते ही बनता था

गोरा रंग, सुडौल बदन

तीखे, नाक नक्श, काली गहरी आंखे

बालों से टपकती पानी की बूंदे …

गुथे हुए बालों पर हीरे के लर चंद्रमा के समान प्रतीत होती थी

सौन्दर्य की मूर्ती थी वो

आँखे जैसे टिक गयी थी … बस देखते रहने का ही मन कर रहा था ..

उसे देख एक अजीब सा नशा सा छा गया

नशा बहुत देर पर टिक न सका

वो उनसे बोली मुझे लगा था की तुम यहीं मिलोगे

हाँ पर तुम्हे आने की क्या जरूरत थी

मेरा भी मन तुमसे मिलने को करता है .. और तुम हो की

तुम जानती हो की मैं रोज नहीं निकल सकता …

हाँ.. और इसी लिए मैं आज यहाँ आई हूँ

आओ रेवती तुम भी बैठ जाओ

हम लोग भी बस बरसात रुकने का इन्तजार कर रहें हैं

कैसे हो तुम लोग,.सुनंदा को तो आज सदियों बाद देखा है, बिलकुल नहीं बदली है और शिवेंद्र तुम कुछ परेशान लग रहे हो

तुम भी बिलकुल नहीं बदली रेवती, समय के साथ तुम्हारा सोंदर्य तो निखरता ही जा रहा है, पर कितने अभागे है हम ..

सब समय का खेल है शिवेंद्र हमारे चाहे से कुछ नहीं होता

मैंने तुमसे प्यार किया है और आगे भी करती रहूंगी जब भी हूँगी तो सिर्फ तुम्हारी׀

तुम दोनों की जोड़ी कितनी सुन्दर लगती है मैं भगवान से मनाऊंगी के तुम दोनों किसी जनम में तो एक हो जाओ

शिवेंद्र बोला, हमारी कहानी तो लगता है अधूरी रह जाएगी

चिंता क्यों करते हो शिवेंद्र ऐसा नहीं है की हम जिन्दगी भर बस भटकते ही रहेंगे, रेवती बोली, किसी न किसी दिन तो अखंडेश्वर महादेव का शिवलिंग मिलेगा, लोग उसे स्थापित करेंगे और हम इन बन्धनों से मुक्ति पा जायेंगे

सुनंदा ने पूछा की वो शिवलिंग कहाँ दबा है और कैसे मिलेगा

शिवेंद्र ने बताया की यहाँ इस खंडहर में १०० मीटर दूर सूखा कुआँ है वो शिवलिंग उसी मैं है परन्तु चूँकि अब यहाँ कोई आता नहीं है और कुआँ भी पौधों से ढक गया है इसलिए बहुत मुश्किल  है पर असंभव नहीं..

सुनंदा बोली तो जिस दिन वो मिल जायेगा हम इन बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे

हाँ

कोई तरीका जिससे हम जल्दी कर सके

रेवती बोली मैंने कोशिश की पर लोग डर के भाग जाते हैं, कोई रुके हमारी बात सुने तो कुछ करे

मैंने सोचा की आज फस ही गया हूँ तो इनकी मदद कर दूँ, शायद खुश हो हीरे मोतियों का पता बता दें सुना है बहुत धन गडा है इस खण्डहर मैं

धन का लालच आदमी से क्या न करवा दे

लालच के आगे डर भी भाग जाता है और भूत भी

दोस्त परिवार सब भुला देता है धन का भूत

जिन्दगी बदल देता है, भूत बना देता है

तो क्या में खंडहर में दबे धन का पता पूछ इनकी मदद करूं

इसमें दोनों का फायदा है

बरसात भी अब रक सी रही थी पौ फटने ही वाली थी

मैं अभी दुविधा में था की वो बोली

सुबह होने को है मुझे जाना होगा लाओ तुम्हे राखी तो बांध दूँ

उसने अपना हाथ हवा में लहराया और कहीं से एक थाली उसके हाथ  में आ गयी

उसने कुमकुम से शिवेंद्र को तिलक लगाया

और उसके हाथ पर राखी बाँधी

भाई बहन का ये प्यार देख मुझसे नहीं रहा गया

मैंने गला खखारा

और उन तीनो का ध्यान मेरी तरफ आकर्षित हो गया

सुनंदा ने अपनी मोमबत्ती मेरी तरफ बढाई

रौशनी का दायरा बढ़ा और उन तीनो की नजर मुझ पर पड़ी

मुझे देखते ही तीनो घबरा से गए

चेहरे सफ़ेद पड़ गए, फक्क सफ़ेद

किसी के मुह से कोई आवाज नहीं निकल रही थी

मैंने सोचा की ये सन्नाटा मुझे ही तोडना पड़ेगा

नमस्कार

मेरा नाम विशेष है और मैं पास गाँव का रहने वाला हूँ

मैं बरसात से बचने इस खंडहर में आया था

काफी देर से आप लोगो की बातें सुन रहा हूँ

उत्सुकता के मारे रहा नहीं गया तो …सोचा परिचय दे दूँ

तीनो ने एक दूसरे की तरफ देखा

आँखों में कुछ इशारे हुए

और शिवेंद्र बोला ..

मेरा नाम शिवेंद्र है और में विजयगढ़ का राजकुमार हूँ

ये मेरी बहन सुनंदा है और यह रेवती, चोपनगढ़ की महारानी

हें, यह कैसे हो सकता है अब तो न कोई विजयगढ़ है और न ही चोपन गढ़

राजा रजवाड़ों को ख़त्म हुए अब सालों बीत गए ..

मैंने सोचा

क्या ये सच में प्रेतात्मा है ?

इसीलिए मुक्ति की बाते कर रहे थे

अखंडेश्वर महादेव के शिवलिंग वाली ?

अब मुझे थोडा डर सा लगने लगा

जाने क्या करेंगे मेरा ये लोग

मैं एक और ये तीन, तलवार भी है इसके पास

माफ़ी चाहूँगा पर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया

मैंने आप लोगो की बातें सुनी

मैं आप की मदद करना चाहता हूँ

आप बताएं की मैं कैसे आप की मदद कर सकता हूँ

शिवेंद्र बोला

आपका बहुत धन्यवाद, आज तक हमसे सब दूर भागते रहे

किसी ने मदद करने की नहीं सोची

आप पहले हैं

अब सुनंदा बोली

आप यदि हमारी मदद करना चाहते हैं तो अखंडेश्वर महादेव का शिवलिंग उस पुराने कुँए से निकाल स्थापित कर दे

कौन सा पुराना कुआँ

वोही जो इस खंडहर से १०० मीटर दक्षिण में है

मैं तो आज यहाँ पहली बार आया हूँ भटकते हुए

मुझे तो कोई कुआँ वूआ नहीं दिखा

रेवती अपनी खनकती आवाज में बोली

दिखेगा कैसे वो तो अब झाड झंकारो से ढका है

अच्छा मैं कल ढूंढता हूँ मिल गया तो आप का काम करने की कोशिश करूंगा

सुनंदा बोली आप का बहुत उपकार होगा हम ५०० सालों से यहीं भटक रहे हैं

५०० साल !! इसका मतलब ये सब भूत हैं

मैं इतनी देर से भूतों के बीच में था ?

क्रमशः…….

गधों पर राजनीति

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राजनितिक जुमलेबाजी अपनी परकाष्ठा पर पहुंची और गधों पर राजनीति होने लगी׀  बेचारे गधे, अब तो लगने लगा है की जैसे गधा होना कोई अपराध हो ׀ अब कोई गधा अपनी मर्जी से तो गधा नहीं बनता ׀ सब घोड़े बनना चाहते हैं, तेज भाग सबसे आगे निकलना चाहते हैं पर ऐसा हो नहीं सकता, बोझ उठाने के लिए भी तो कोई चाहिए, इसलिए गधा समाज के लिए जरूरी है ׀

आप कहेंगे की समाज बदल रहा है साइंस ने प्रगति की है अब बड़ी अश्व शक्ति वाले उन्नत साधन उपलब्ध हैं तो गधे पर लदाई क्यों ? अब तो इसरो भी बैलगाड़ी पर उपग्रह नहीं ढोता, उन्हें भी बढ़िया गाडी मिल गयी है तो आप अभी भी क्यों गधों के पीछे पड़े हैं׀ उन्हें भी उन्मुक्त वातावरण में खुल के सांस लेने दे ׀ जंगलो मैं उन्मुक्त विचरण करने दे ׀ परन्तु आप को उसमे भी ख़ुशी नहीं, की गधा क्योंकर मुक्त हो गया ? कच्छ के अभ्यारण को फिर युद्ध का मैदान बनाने की तैयारी है ׀

कृष्ण, सिकंदर, विक्रमादित्य, गजनी, खिलजी, कच्छ का बटवारा और १९६५ की लड़ाई सब यहीं हुआ, यहाँ जो जीता उसने हिंदुस्तान पर राज किया ׀कच्छ में चक्रवात भी आये और भूकंप भी लेकिन फिर भी जंगली गधे वहीँ बने रहे ׀ अब एक बार फिर कच्छ पर राजनितिक युद्ध शुरू हुआ है देखना है कौन इसे जीतता है ׀ पर इस बार ये युद्ध जमीन पर नहीं, बिचारे गधो पर लड़ा जा रहा है ׀पंचतंत्र की कहानियों पे पला बढ़ा आम भारतीय हमेशा जानवरों से ही प्रेरणा लेता है ׀ राजनीति में अभी तक हाथी, शेर, गिद्द, कुत्ते ही थे अब गधो ने जोरदार प्रवेश किया है ׀ लोमड़ी और उलूक प्रतीक्षा में है और चर्चा है कि वो भी जल्द भारतीय राजनिति में प्रवेश करेंगे ׀

लेकिन भाई अपमान की भी कोई हद होती है ׀ कोई सिर्फ गधा कहता तो चलता पर कहा भी तो “भारतीय जंगली गधा” यह तो घोर अपमान की बात है एक भारतीय, दो जंगली, और उपर से तीसरा गधा ׀ घोर अनादर ׀   माना हम भारतीय कानून का पालन नहीं करते, न हम हेलमेट लगते हैं न सीट बेल्ट, जहाँ देखो वहां थूक देते हैं, कचरा फैलाते हैं खुले में शौच करते हैं, पर न तो भारत जंगल है और न हम भारतीय जंगली गधे ׀ माना कूड़ेदान, पीकदान नहीं हैं, शौचालय नहीं है, सड़के नहीं हैं, बिजली नहीं हैं, खाने को नहीं हैं, अगर चीन नहीं होता तो मोबाइल क्रांति भी न आती, किन्तु परन्तु, भाई अपमान तो न करो, मजबूरी समझो ׀ कितनी देर रोक कर रख सकते हैं ? अगर रेगिस्तान में पानी होता तो गधा क्यों नहीं नाहता ? समझिये इस भारतीय जंगली गधे से शिक्षा लेने की जरूरत है ׀

आप ये सोच रहे होंगे की गधे से क्या शिक्षा मिल सकती है ׀ अरे जब सब जानवरों से शिक्षा मिलती है तो गधे से क्यों नहीं? गधा बोझ ढोता है लेकिन उफ्फ तक नहीं करता, घर से सीधा घाट और घाट से सीधा घर आता है, इधर उधर नहीं देखता, दुःख हो या सुख, ख़ुशी हो या गम कभी चेहरे पर नहीं आने देता, हमेशा भावशून्य बना रहता है ׀ घोड़े का छोटा भाई है लेकिन कभी उससे प्रतिद्वंदिता नहीं रखता ׀ और विशेषकर याद रखने योग्य ये है कि जब उसे गुस्सा आता  है तो …… अपनी प्रसिद्ध दुल्लती जड़ देता है ׀ इसीलिए बैल के आगे और गधे के पीछे कभी खड़ा नहीं होना चाहिए ׀

गर्दभ और गंदर्भ में सिर्फ एक बिंदी का फर्क होता है और ये एक वोट की बिंदी गधे को देवता और देवता को गधा बना सकती है ׀ गधे का अनादर कर जो दुःख उसे दिया हैं तो कहीं ऐसा न हो की गुस्से में दुल्लती चले और आप “गधे के सर पर सींग” की तरह गायब हो जाएँ ׀

गदर्भ पुराण आगे भी जारी रहेगा

Quality verses affordability

Attempts to provide affordable healthcare to all is a welcome step. However, it should not be at the cost of denying latest technology and quality interventions to those who can afford. The recent order of National Pharmaceutical pricing authority (NPPA) is a welcome step on one hand as this will lead to improve the reach of the poor as they will now be able to afford the drug eluting stents at a competitive price. However, on the other it will lead to non availability of the better quality and latest technology to even those who can afford.

Quality and affordability has always been important issues, while in west it is quality that always reign supreme in the developing countries it’s the cheap, low quality material that wins the race. This is not limited to medical devises alone be it a cars and its the same. With most cars driving on the Indian roads not being accident safe, however as they are cheap they are permitted and they sell as they are affordable. The consequences of compromising the quality are never debated in this country.

When we talk of coronary stents and not going into the science of it, basically there are three kinds available to us Indians based on certifications. One approved by DCGI, the Indian regulator and most of these are indigenous made by a few select companies. Second those with CE certification, here too the certification can be from any European country and not all countries have the same level of quality assurance. For example certification from countries like Germany and France cannot be compared with countries like Bulgaria, Croatia, Cyprus, Estonia, Latvia, Greece, Lithuania, Slovakia, Slovenia etc. So to assume that all these countries apply the same yardstick when they CE certify a product is unimaginable. Hence, its safe to assume that the quality will differ by country of certification. The third and the most robust of all certification system is the USFDA. At present, this is supposed to be most rigorous of all the system of certifications. The requirements are so tough that most stents that are currently DCGI or CE certified may not actually get a USFDA certification. As the requirement of certification becomes harsher, the amount of funding and the clinical trial data required becomes enormous, and many companies cut corner by getting a cheaper and more amenable certification rather going for the best in class.

It is true that one does not require USFDA approval for selling their products in India, as for this DCGI approvals are required. However, it is clear that requirements in India is not as stringent as required in US by FDA. Hence, of most stents available, only a handful have approval of USFDA and these are the stents that are priced very high. The questions now are two, should we compromise on quality in guise of affordability? and Should we deny those who can afford the quality medical care? If the answer to both the questions in your mind is yes, then we should make it mandatory for every Indian to be treated in government health setup, right from primary health centres to Apex institutions and close all private clinics and hospitals, so as to ensure that all Indians receive the same treatment and there are no class differences between treatment and outcome.

Second, we should do this for all other consumer items, for example cars. Enforce that Indians will travel only in Nano and no one in the country will drive a Audi, BMW or Mercedes. Or better still ask these companies to sell their cars at a price of Nano. We should also do the same for all consumer items like phones, Television etc. And more importantly, why no body thought of controlling the price of food items, like wheat or rice or pulses. Why not have a ceiling on their prices as well. The cost of controlling  the food prices will benefit more Indians than controlling the price of coronary stents. As the stents which will be available at the ceiling price were actually available below this price even before the order came, and those which were at a price higher will never reduce their cost, they will withdraw the product from the market and sell elsewhere instead. Its a global market.

The country needs to discuss the greater issue of quality verses affordability and to me the only way this can be tackled is by making people affordable rather then compromising the quality for cheap popularity. The debate is on. I wish more people join the ongoing deliberations.

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